आम्रपाली समूह की कंपनी में धोनी की पत्नी साक्षी 25 फीसदी शेयरधारक थीं
महेन्द्र सिंह धोनी दावा करते रहे हैं कि आम्रपाली से उनका नाता महज कंपनी के ब्रांड एंबेसेडर होने का रहा है. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद धोनी और धोखाधड़ी में दोषी पाई गई कंपनी आम्रपाली के आपस के संबंध एक अलग ही कहानी बयान कर रहे हैं.
महेन्द्र सिंह धोनी की पत्नी साक्षी सिंह धोनी आम्रपाली माही डेवलेपर्स प्राइवेट लिमिटेड (एएमडीपीएल) कंपनी में निदेशक के पद पर थीं. इस कंपनी में वह 25 फीसदी शेयरधारक थी. इसी कंपनी में आम्रपाली समूह के मुख्य प्रबंध निदेशक अनिल कुमार शर्मा भी 75 फीसदी (सितंबर 2014 तक) शेयरधारक थे.
सुप्रीम कोर्ट में जमा किए आम्रपाली समूह के फॉरेंसिक ऑडिट के अनुसार एएमडीपीएल आम्रपाली समूह की 47वीं कंपनी थी. इस कंपनी को कथित रूप से घर खरीदारों का पैसा लेकर दिया जाता था. इसमें रियल एस्टेट समूह अपनी सहायक कंपनियों को फंड देती थी.
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार कथित तौर पर घर खरीदारों का लगभग 5,619 करोड़ रुपये आम्रपाली समूह ने इन कंपनियों को दिया था.
जिस रिपोर्ट में एएमडीपीएल को घर खरीदारों का पैसा लेने वाले सूची में डाला गया है, उसमें लिखा है, “सभी शेयर कैपिटल नकद में लिया गया है. और सभी खर्च नकद में चुकाया गया है.”
यह कंपनी साल 2011 के दिसंबर में बनी थी. उपलब्ध डेटा के अनुसार कंपनी के दायर रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी (आरओसी) में वित्तीय वर्ष 2012-13-14 में किसी भी तरह का संचालन, राजस्व या लाभ होने की बात नहीं है.
ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है, “हमें मौखिक रूप से जानकारी मिली थी कि यह कंपनी रांची में एक प्रोजेक्ट के डेवलपमेंट के लिए बनाई गई है. इस प्रोजेक्ट में शामिल कंपनियों के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) भी दर्ज किया गया था. हालांकि हमें उसकी प्रति नहीं दी गई है.”
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घर खरीदारों के गुस्से का सामना करने के बाद 2016 में धोनी ने खुद को आम्रपाली समूह से अलग कर लिया था.
तीन साल बाद धोनी ने मार्च 2019 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. धोनी ने 2016 तक आम्रपाली समूह के लिए ब्रांडिंग और मार्केटिंग की थी. वह अपने बकाया 40 करोड़ रुपये पाने में कोर्ट की मदद चाहते थे.
ऑडिट रिपोर्ट के निष्कर्षों को संज्ञान में लेते हुए मंगलवार 23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को दोषी पाया. कोर्ट ने कहा, “फॉरेंसिक ऑडिटर्स के रिपोर्ट को देखते हुए पाया गया है कि कंपनी ने धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग की है. और यह साफ जाहिर है कि कंपनी ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (एफईएमए- फेमा) का उल्लंघन किया है. हमने प्रवर्तन निदेशालय और संबंधित अधिकारियों को मामले की जांच के आदेश दिए हैं. और इसके लिए जो भी दोषी हैं उनको जिम्मेदार बनाया जाए. साथ ही जांच की सभी रिपोर्ट कोर्ट में जमा की जाए. और अब तक की गई पुलिस की जांच रिपोर्ट को भी जमा किया जाए.”
जांच में एक अन्य तथ्य सामने आया है. ऑडिटर्स ने पाया है कि आम्रपाली समूह की एक अन्य कंपनी आम्रपाली सफायर डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने ऋति स्पोर्ट्स मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को साल 2009-15 के बीच कुल 42.22 करोड़ रुपयों में से 6.52 करोड़ रुपये का भुगतान किया था.
ऋति स्पोर्ट्स मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी धोनी के प्रायोजकों और विज्ञापनों का प्रबंधन करती है.
ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि आम्रपाली समूह और ऋति स्पोर्ट्स मैनेजमेंट ने आपस में सादे कागज पर समझौता किया था.
ऋति स्पोर्ट्स मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड के हस्ताक्षरकर्ता अरुण पांडे के पक्ष में कोई संकल्प पत्र संलग्न नहीं था. यह इंगित करते हुए ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है, “इससे साफ जाहिर होता है कि जो समझौता इन दो कंपनियों के बीच हुआ था वह महज पैसे के भुगतान के लिए था. और वह भी झूठा समझौता था. घर खरीदारों का पैसा गलत और गैरकानूनी तरीके से ऋति स्पोर्ट्स मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को भुगतान किया गया है. हमारी राय में उक्त समझौता कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरा है, इसलिए कंपनी से पैसे बरामद करना चाहिए.”
ऋति समूह ने आम्रपाली में साक्षी धोनी के शेयरधारक होने पर कोई टिप्पणी नहीं की. न ही घर खरीदारों के पैसे कंपनी को दिए जाने पर कुछ कहा.
इस मामले पर ऋति समूह ने कहा, “हम केवल यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि फॉरेंसिक रिपोर्ट में उल्लिखित उचित जानकारी और प्रासंगिक दस्तावेजों से परे है. पैसे के गैरकानूनी या गलत तरीके से लेनदेन का सवाल ही नहीं उठता है. क्योंकि कंपनी ने कई व्यावसायिक सेवाएं समझौतों के अनुसार प्रदान की है. इसके अलावा आम्रपाली से समझौता किए गए प्रायोजकों की फीस प्राप्त होने के बाद उसका भुगतान संबंधित फिल्मी और खेल की हस्तियों को कर दिया गया था. असल में हम लगभग 40 करोड़ रुपयों के वैध व्यावसायिक दावा करते हैं, जो आम्रपाली को हमें भुगतान करना बाकी है. हम वह वसूलने के लिए कदम उठा रहे हैं.”
ऋति समूह ने कहा कि फोरेंसिक ऑडिट के दौरान कंपनी ने पूरा सहयोग किया था. और सभी जानकारी और दस्तावेज भी उपलब्ध किए थे.
कंपनी ने कहा, “हमें कोई अन्य दस्तावेज उपलब्ध करने के लिए नहीं किया गया था. न ही कोई अन्य जानकारी मांगी गई थी. रिपोर्ट में अनिल शर्मा या ऋति के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता का मुद्दा उठाया गया है लेकिन हमें इस बारे में कभी स्पष्ट करने का मौका नहीं दिया गया जिससे ऑडिटर्स संतुष्ट हो पाते.”
ऋति कंपनी ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “हम फिलहाल कानूनी सलाह ले रहे हैं, और उसी के मुताबिक आगे कोई भी कदम उठाएंगे.”