मॉरिशस दस्तावेजों में कई भारतीय कंपनियों के नाम


govt refused to review proposal for increase in super rich tax

  प्रतीकात्मक चित्र

पानामा पेपर्स, स्विस लीक और पैराडाइज पेपर के बाद अब मॉरिशस से मिले दस्तावेजों से पता चला है कि किस तरह से टैक्स बचाने के लिए इस देश का भरपूर उपयोग किया गया. 200,000 ई-मेल, समझौते और बैंक स्टेटमेंट के हवाले से कहा गया है कि टैक्स से बचने के लिए व्यवसायी समूहों ने मॉरिशस के साथ हुए टैक्स समझौते का गलत फायदा उठाया.

खोजी पत्रकारों का अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईसीआईजे) और इंडियन एक्सप्रेस ने इन दस्तावेजों के आधार पर डेटा इकट्ठा किया है. ये सूचना कॉनर्स डिल एंड पीयरमैन नाम की विदेशी कंपनी से मिले आंकड़ों पर आधारित है.

भारत और मॉरिशस के बीच 1982 में दोहरे कराधान से बचाव का समझौता (डीटीएए) हुआ था. यहां पर रेजीडेंट कंपनी के लिए कोई भी आवेदन कर सकता है. रेजीडेंट कंपनी को मॉरिशस में टैक्स नहीं देना पड़ता है. इस समझौते की खामियों का फायदा उठाकर निवेशक भारत में कैपिटल गेन टैक्स देने से बच जाते हैं और उन्हें मॉरिशस में भी टैक्स नहीं देना पड़ता है.

इस संधि के 33 साल के दौरान लगातार इसके दुरुपयोग की बातें सामने आती रहीं. जिनमें सबसे ऊपर राउंड ट्रिपिंग है. राउंड ट्रिपिंग में भारतीय निवेशक मॉरिशस के माध्यम से अपना ही पैसा वापस निवेश करते थे. जिससे उन्हें कैपिटल गेन टैक्स नहीं देना पड़ता था.

इससे निपटने के लिए दोनों देशों ने 10 मई 2016 को डीटीएए में सुधार किया. इसके तहत अगले दो सालों में अलग-अलग दौर में कैपिटल गेन टैक्स लगाया गया. इसे अप्रैल 2019 से पूरी तरह से लागू होना था.

इस समझौते में सुधार होने के बाद से कंपनियों ने निवेश के लिए मॉरिशस के रास्ता अपनाना कम कर दिया. इससे निवेश के मामले में इसका एकतरफा दौर खत्म हो गया. आंकड़ों में भी इसे साफतौर पर देखा जा सकता है. पिछले साल की तुलना में साल 2018-19 में इस देश से भारत आने वाली एफडीआई में 44 फीसदी की गिरावट आई.

इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र ने लिखा है कि वो लगातार इस मामले को प्रकाशित करेगा. इसमें दस्तावेजों के हवाले से बताया जाएगा कि किस तरह से कंपनियों ने निवेश के लिए मॉरिशस के रूट का प्रयोग किया.

कॉनर्स के दस्तावेज पैराडाइज पेपर के साथ मिलाने पर पता चलता है कि किस तरह से भारत में सूचीबद्ध कंपनी रिलेगेयर इंटरप्राइजेज लिमिटेड ने जर्सी की फर्म को धन पहुंचाया. इस फर्म के मालिक मालविंदर सिंह और शिवेंदर सिंह हैं.

इस बारे में ज्यादा जानकारी से साफ होता है कि सिंह बंधु और उनकी टैक्स हेवेन स्थित कंपनियों ने किस तरह से धन जुटाया. इसे भारतीय कंपनियों में निवेश किया और फिर इसे रूट किया.

कॉनर्स, पुणें आधारित रियल स्टेट कंपनी कोल्टे पाटिल डेवलपर्स और पोर्टमैन होल्डिंग्स को कानूनी सुविधा देती है. पोर्टमैन होल्डिंग्स यूएस आधारित रियल स्टेट कंपनी है. ये भारत में बहुत से रिहायशी प्रोजेक्ट पर काम कर रही है.

इन रिकॉर्ड में एक कमोडिटी ट्रेडिंग कंपनी और जिंदल स्टील एंड पॉवर के बीच चार वाहक पोत के लिए हुए सौदे का भी जिक्र है. ये सौदा मॉरिशस की एक कंपनी पैनकोर के माध्यम से हुआ था. इसके बाद 2012 में इस कंपनी ने चीनी बिल्डर के साथ चार वाहक पोत का सौदा 108 मिलियन डॉलर में किया.

मायो फाउंडेशन ने साल 2011 में अपोलो हॉस्पिटल के साथ समझौता किया. इसके तहत हैदराबाद एरपोर्ट के पास एक उच्च सुविधाओं वाला हॉस्पिटल बनाया जाना था. इसके लिए कंपनी ने मॉरिशस का रास्ता अपनाने की कोशिश की. मॉरिशस में मायो मॉरिशस नाम से एक कंपनी बनाई गई. लेकिन बाद में इस प्रोजेक्ट पर आगे काम नहीं हो सका.

इस बारे में वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया, “इस संधि के चलते कोई कराधान लागू नहीं हो पा रहा था. ये महत्वपूर्ण था कि पूरी एफडीआई का एक तिहाई हिस्सा मॉरिशस के माध्यम से आया. इसलिए भारत में इसको लेकर चिंताएं उठ रही थीं. 1993 में इस संधि पर पुनर्विचार का प्रयास किया गया. लेकिन तब मॉरिशस की ओर से इसका जोरदार विरोध हुआ. उनको इससे कई तरह का लाभ हो रहा था. इसलिए मॉरिशस इस पर विचार के लिए तैयार नहीं था. बाद में वे दोबारा बातचीत के लिए तैयार हो गए, लेकिन वे इसे बदलने के लिए सहमत नहीं हुए. 2016 में हमने उन्हें इसके लिए मना लिया.”


उद्योग/व्यापार