RBI के आंकड़ों के मुताबिक देश की घरेलू बचत 10 साल के निम्नतम स्तर पर
भारत में घरेलू क्षेत्र की बचत गिरकर चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है. हालत यह है कि इस समय ये 10 साल के निम्नतम स्तर पर है. वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र को जाने वाला खुदरा कर्ज सालाना दोगुने अंको में बढ़ रहा है. अर्थशास्त्रियों ने इस खर्च को लेकर चेताया है. भारतीय अर्थव्यवस्था में घरेलू क्षेत्र की बचत, निवेश का सबसे बड़ा स्त्रोत है.
विशेषज्ञों के मुताबिक घरेलू स्तर पर लगातार बढ़ती देयता अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है. साल 2018 में देश की बचत दर या सकल घरेलू बचत साल 2008 के 37 फीसदी की जगह 30.5 फीसदी पर आ गई.
खपत में बढ़ोतरी या अन्य वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री में होने वाली वृद्धि का कारण घरेलू स्तर पर लिया जाने वाला खुदरा कर्ज है. ये कर्ज इस समय सालाना 17 फीसदी की तेज दर से बढ़ रहा है.
घरेलू स्तर पर लिए जाने वाले कर्ज में तेजी का कारण उद्योगों की ओर जाने वाले कर्ज में कमी होना भी है. बीते पांच सालों से लगातार एनपीए में बढ़ोतरी हो रही है, जिसके चलते बैंक इस क्षेत्र को कर्ज देने में बहुत सावधानी बरत रहे हैं. इस तरह से उद्योगों की ओर जाने वाला कर्ज घरेलू क्षेत्र की ओर जा रहा है.
घरेलू बचत, अर्थव्यवस्था को फंड करने के लिए सबसे बड़ा स्त्रोत है. इसका कारण ये है कि घरेलू बचत का प्रवाह सरकारी और कार्पोरेट दोनों क्षेत्रों की ओर होता है.
किसी भी अर्थव्यवस्था में निवेश को बचत के समान लिया जाता है. क्योंकि जो आय खर्च नहीं होती है वो बचत के रुप में इकट्ठा होती है, जिसे बाद में निवेश करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
भारत के लिहाज से घरेलू बचत निवेश के लिए पर्याप्त नहीं होती है. इसकी पूर्ति के लिए महंगी विदेशी बचत का प्रयोग होता है. इससे देश के चालू खाते के घाटे में इजाफा होता है.
राष्ट्रीय लोक वित्त संस्थान के अर्थशास्त्री एनआर भानुमूर्ति कहते हैं कि कम बचत देश में मंदी के पीछे एक बड़ा कारण है.
जनवरी-मार्च की तिमाही में देश की जीडीपी वृद्धि दर 5.8 फीसदी के साथ पांच साल के निम्नतम स्तर पर थी.
घरेलू बचत में कॉर्पोरेट बचत, सरकारी क्षेत्र की बचत और परिवार स्तर पर हुई बचत को शामिल किया जाता है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों से पता चलता है कि घरेलू बचतों में सबसे ज्यादा कमी परिवार के स्तर पर होने वाली बचत में हुई है.
ज्यादातर अर्थशास्त्री मानते हैं कि किसी देश का आर्थिक विकास निवेश आधारित होना चाहिए ना कि खपत आधारित. भारत के मामले में आर्थिक विकास खपत आधारित है.
रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक देश में घरेलू बचत के मुकाबले देयता बहुत तेजी से बढ़ रही है. साल 2009-10 में जहां ये 203,400 करोड़ थी, वहीं अब ये 200 फीसदी की दर से बढ़कर 673,900 करोड़ पर पहुंच गई है.