पेट्रोल-डीजल के ‘सेस’ से मिली रकम में सरकार ने 17,000 करोड़ की हेर-फेर की


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सरकार पेट्रोल और डीजल पर सेस और सरचार्ज लगाकर उनकी कीमतों में इजाफा कर देती है. इस तरीके से मिले फंड का उपयोग विशेष उद्देश्यों के लिए किया जाता है. लेकिन क्या सरकार इस धन का उपयोग उस उद्देश्य में कर रही है, जिसके लिए इसे वसूला जा रहा है? बजट के आंकड़ों से ये बात सामने आई है कि साल 2018-19 के दौरान सरकार ने सेस से प्राप्त फंड में से 17,000 करोड़ रुपये का उपयोग वांछित उद्देश्य में ना करके कहीं और किया.

इस बार पांच जुलाई को पेश बजट में तेल की कीमतों पर सेस के रुप में एक रुपया अलग से जोड़ दिया गया. इस तरीके से जो धन एकत्र होगा उसे केंद्रीय सड़क और अवसंरचना निर्माण फंड यानि कि सीआरआईएफ में जाना है.

सेस या उपकर मुख्य टैक्स पर लगने वाला एक अतिरिक्त टैक्स होता है, जो किसी विशेष उद्देश्य के लिए लगाया जाता है. उदाहरण के लिए शिक्षा उपकर या सड़क उपकर.

आंकड़े कहते हैं कि बीते वित्त वर्ष में सरकार ने सेस के माध्यम से 1.13 लाख करोड़ एकत्र किए थे. वित्त वर्ष 2019-20 में इससे करीब 1.27 लाख करोड़ रुपये एकत्र होने की संभावना है. लेकिन ये सब सीआरआईएफ में नहीं जा रहा.

ये बात तब सामने आई जब भारतीय राष्ट्रीय हाईवे प्राधिकरण (एनएचएआई) और सड़क मंत्रालय को विकास कार्य के लिए धन जुटाने में मुश्किल होने लगी. इसके बाद एनएचएआई निजी निवेश की ओर देखने लगा. इसके लिए ‘बनाओ-चलाओ-स्थानांतरित करो’ वाले मॉडल को फिर से शुरू करने का प्रयास किया जाने लगा.

बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि जब इस बारे में वित्त मंत्रालय के अधिकारियों से बात करने का प्रयास किया गया तो कोई संपर्क नहीं हो पाया. हालांकि एक उच्च अधिकारी ने कहा कि इस बार जितने फंड की बात की जा रही है वो सिर्फ आंकलन है.

डेलोइटी इंडिया के सहयोगी विश्वास उदगिरकर कहते हैं, “सरकार अब धीरे-धीरे सेस के फंड को अलग-अलग मदों में खर्च कर रही है, जबकि एनएचएआई का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है. ऐसा हाईवे के ईपीसी और हाइब्रिड प्रोजेक्ट के चलते हो रहा है.”

सरकार ने साल 2018-19 में इस फंड से 9,013 करोड़ रुपये निकाले जिसे दूसरी अज्ञात मदों में खर्च किया गया. इसी प्रकार 7,920 करोड़ साल 2019-20 में भी अलग मदों में खर्च किए जाने हैं.

तेल पर अलग से लगने वाले करों में सिर्फ सेस नहीं है, इस बार वित्त मंत्री ने पेट्रोल-डीजल पर एक रुपया सरचार्ज भी लगा दिया है. जिससे इनकी कीमतों में कुल दो रुपये की बढ़ोतरी हो गई है.

इसके अलावा सीमा शुल्क पर भी सेस लगाया जाता है, जिससे इसकी बेंचमार्क कीमतों में भी बढ़ोतरी होती है. इस तरह से अगर देखें तो इनकी कीमतों में दो रुपये से अधिक की बढ़ोतरी हो गई है.

पेट्रोल पर लगने वाला पूरा केंद्रीय कर अब करीब 19.98 रुपये हो गया है. और ब्रॉडेड पेट्रोल के मामले में ये 21.16 तक पहुंच गया है. इसी तरह डीजल पर कुल कर 15.83 रुपये पड़ता है.

इस हिसाब से एक लीटर पेट्रोल और डीजल बिकने पर सरकार के खाते में नौ रुपये संरचनात्मक निर्माण के मकसद से जाते हैं.

सबसे पहले साल 1998 में अटल बिहारी सरकार ने सड़क निर्माण के उद्देश्य से पेट्रोल पर रोड सेस लगाया था. जिसका अगले साल डीजल तक विस्तार कर दिया गया.

नरेंद्र मोदी सरकार ने वित्त वर्ष के खत्म होने पर वापस ना होने वाले फंड को दूसरी मदों में खर्च करने के लिए ‘केंद्रीय रिजर्व फंड एक्ट’ में सुधार किया और इसका नाम बदलकर ‘सेंट्रल रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड’ कर दिया.

इस सुधार के बाद रोड सेस सबसे पहले भारत की संचित निधि में जाता है. टैक्स एकत्र करने में लगे खर्च को काटकर बचा धन सीआरआईएफ के खाते में चला जाता है. इन दिनों सरकार नवोदय विद्यालयों को इसी फंड से 2,926 करोड़ रुपये दे रही है.

इस एक्ट में सुधार से पहले डीजल से मिले सेस का आधा हिस्सा ग्रामीण सड़कों पर खर्च किया जाता था. इसके बाद तेल से मिले कुल सेस का 57.5 फीसदी हाईवे के निर्माण में खर्च किया जाता था. जबकि 12.5 फीसदी रेलवे के अंडर और ओवर पास बनाने में खर्च किया जाता था. राज्यों को सड़कों की मरम्मत के लिए इसका 30 फीसदी हिस्सा दिया जाता था.


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