छोटे उद्योगों की मदद के लिए विदेशी करदाताओं की ओर देख रही है सरकार
घरेलू बैंकिंग प्रणाली के लचर प्रदर्शन और नौकरी के मौके ना बना पाने के चलते सरकार विदेशी देनदारों से उधार लेने का विकल्प तलाश रही है. सरकार छोटे उद्योगों की मदद के लिए विदेशी करदाताओं से करीब 14,500 करोड़ डॉलर उधार लेने के लिए बातचीत कर रही है.
रॉयटर एक अधिकारी के हवाले से लिखता है कि इस सिलसिले में सरकार कई विदेशी फर्मों से बातचीत कर रही है. इसमें जर्मनी की सरकारी विकास बैंक केडब्ल्यूएफ समूह का नाम भी शामिल है. इसके अलावा विश्व बैंक और कुछ कनाडा के संस्थानों से भी बात चल रही है.
केडब्ल्यूएफ के भारत स्थित कार्यालय ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है. इस तरह से लिया गया धन छोटे उद्योगों, सौर ऊर्जा उत्पादन आदि में इस्तेमाल होगा. केडब्ल्यूएफ के मुताबिक बातचीत अभी शुरुआती दौर में ही है.
कुछ इसी तरह का बयान विश्व बैंक की ओर से भी आया है. बैंक के प्रवक्ता ने कहा कि अभी बातचीत शुरू हुई है. आगे की बैठकों में इसकी रूपरेखा सामने आएगी.
खबरों के मुताबिक भारत इस तरह से करीब एक लाख करोड़ रुपये जुटाना चाहता है. ऐसा भारतीय बैंकों के पास पूंजी की कमी के चलते किया जा रहा है. इस समय भारतीय बैंक उद्योगों को धन उपलब्ध कराने में पूरी तरह से सक्षम नजर नहीं आ रही हैं, जिसके चलते नौकरियों के मौके पैदा नहीं हो पा रहे हैं.
एक अन्य अधिकारी ने बताया, “हम तलाश कर रहे हैं, फंडिंग संस्थाओं से बात कर रहे हैं कि क्या किया जा सकता है.” हालांकि अधिकारियों ने बैंकों से हुई बातचीत का ब्योरा देने से इनकार कर दिया.
खबरों के मुताबिक एमएसएमई मंत्रालय इस बारे में बातचीत को आगे ले जा रहा है. इसकी कोशिश है कि विदेशी वित्तीय संस्थाओं को वित्त मंत्रालय के साथ समझौते पर पहुंचने के करीब लाया जाए. इस बारे में वित्त मंत्रालय ही अंतिम निर्णय लेगा.
इससे पहले सरकार विदेश से पैसा लाने के लिए फॉरेन करेंसी बान्ड लाने की बात कह चुकी है. इसे उसी कड़ी में आगे की कार्रवाई माना जा रहा है.
देश की छह लाख से अधिक माइक्रो, स्माल और मध्यम कंपनियां देश की एक तिहाई विनिर्माण और सेवाओं के लिए जिम्मेदार हैं. जो इस समय बुरी स्थिति से गुजर रही हैं. अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए इनकी मदद जरूरी हो गई है.
इस समय जीडीपी की सेहत भी अच्छी नहीं है. जनवरी से मार्च की तिमाही में ये पांच साल के न्यूनतम स्तर 5.8 फीसदी पर जा पहुंची. जबकि दूसरी ओर सरकार इसे आठ फीसदी से ऊपर ले जाने की बात कह रही है.