NSSO के सर्वे से जीडीपी गणना के तरीके पर उठे नए सवाल


nsso survey raise fresh questions on GDP calculation

 

जीडीपी आंकड़ों की गणना को लेकर हमेशा बहस बनी रहती है, लेकिन एनडीए सरकार के कार्यकाल में इस बहस को नया बल मिला है. इस दौरान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एजेंसिया सरकारी मंशा पर भी लगातार सवाल उठाती रही हैं. अब राष्ट्रीय सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के अध्ययन में इस बारे में एक नई बात सामने आई है.

इस अध्ययन के बाद एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की जीडीपी गणना में नई खामियां सामने आई हैं, जो कुछ नए सवालों को जन्म दे रही हैं. एनएसएसओ का ये अध्ययन 12 महीनों में हुआ और जून 2017 में खत्म हुआ है. लेकिन इसे अभी हाल में ही जारी किया गया है.

इस अध्ययन में एमसीए-21 डाटा बेस का हिस्सा रही और जीडीपी की गणना में  इस्तेमाल हुईं करीब 36 फीसदी कंपनियों के बारे में कोई जानकारी नहीं हो सकी. अध्ययन में ये भी पता चला कि इन कंपनियों का वर्गीकरण भी गलत ढंग से किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, कारपोरेट मामलों के मंत्रालय ने इन्हें ‘सक्रिय कंपनी’ के रूप में लिस्ट कर रखा है.

कारपोरेट मंत्रालय किसी भी ऐसी कंपनी को जो पिछले तीन साल में एक बार भी टैक्स भरती है, सक्रिय कंपनी के रूप में दर्ज करता है.

विशेषज्ञों के मुताबिक ये अध्ययन केंद्रीय सांख्यिकी ऑफिस (सीएसओ) के पतन को उजागर कर रहा है. सीएसओ कभी पूरी दुनिया में अपनी गुणवत्ता और भारत के आधिकारिक आंकड़ों की विश्वसनीयता के लिए जाना जाता था.

आर नागराजन इंदिरा गांधी विकास और शोध संस्थान मुंबई में प्रोफेसर हैं. वे कहते हैं, “हम में से कुछ लोग लगातार सीएसओ से कहते रहे हैं कि एमसीए-21 के आंकड़ों को राष्ट्रीय खातों में प्रयोग करने से पहले सत्यापित कर लिया जाना चाहिए. लेकिन उन्होंने बिना किसी सत्यापन या बहस के नई सीरीज को अंतिम रूप दे दिया.”

एनडीए से पहले यूपीए सरकार में जीडीपी गणना के लिए इस तरीके से डाटा का प्रयोग नहीं होता था. साल 2015 से सीएसओ ने आंकड़ों के संग्रहण के लिए एमसीए-21 का प्रयोग करना शुरू किया.

सीएसओ ने इसे कार्पोरेट मंत्रालय की वेबसाइट से लिया. शुरुआत में ही जब इस तरीके का प्रयोग किया गया तो कई विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया. प्रोफेसर नागराज इसका विरोध करने वाले पहले व्यक्ति थे.

इसके आलोचकों का कहना था कि जीडीपी के लिए उस डाटा बेस का प्रयोग करना जिसमें बहुत सारी फर्जी कंपनियां सूचीबद्ध है, ठीक नहीं होगा. इसमें कई कंपनियां तो ऐसी हैं जो सिर्फ कागज पर हैं. असलियत में उनका कोई अस्तित्व ही नहीं है.

इन विशेषज्ञों का कहना था कि इस तरह के आंकड़ों को प्रयोग में लाने से पहले उन पर शोध होना चाहिए. उनका मांग थी कि इन आंकड़ों को शोधकर्ताओं और आम जन के लिए खोल देना चाहिए.

इस तरह से हर यूनिट के स्तर पर डाटा का सत्यापन संभव हो सकेगा. यहां तक कि जो लोग इस तरीके के पक्ष में थे उन्होंने भी ऐसी ही मांग की.

सीएसओ के सांख्यिकीविदों अब तक इस नए तरीके का बचाव करते रहे हैं, हालांकि इसे सार्वजनिक करना बंद कर दिया गया है. लेकिन उनके सहयोगी एनएसएसओ के सहयोगी सांख्यिकीविद इसको लेकर एतराज जता रहे हैं. उनका मानना है कि इस तरीके में बहुत कमियां है.

इसमें उन फर्जी कंपनियों के डाटा को जीडीपी गणना में शामिल किया जा रहा है जो सिर्फ कागज पर हैं.

जब इस नई सीरीज की शुरुआत की गई तब टीएसए अनंत मुख्य सांख्यिकीविद थे. जब उनसे इस विषय पर बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वे लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं इसलिए रिपोर्टर से बात नहीं कर सकते.


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