राकेश अस्थाना को दागदार होने का ईनाम?


 

क्या सीबीआई के विशेष निदेशक पद से हटाए जाने के बाद राकेश अस्थाना की नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस) के महानिदेशक पद पर नियुक्ति में कोई राजनीतिक संदेश छिपा है? ये सवाल इसलिए उठा है क्योंकि राकेश अस्थाना की इस पद पर नियुक्ति के लिए ही इस पद को अस्थायी तौर पर महानिदेशक स्तर का बनाया गया है.

अस्थाना फिलहाल सीबीआई के विशेष निदेशक पद पर रहते हुए किए गए भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में जांच का सामना कर रहे हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने कुछ दिन पहले अस्थाना की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने इन मामलों में अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग की थी. सवाल उठ रहा है कि खुद भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे अस्थाना को महानिदेशक जैसे पद पर बैठाकर सरकार क्या संदेश देने की कोशिश कर रही है?

सरकार की इस मंशा पर सवाल इसलिए भी गहरा रहे हैं क्योंकि राकेश अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहे सीबीआई के अन्य दो अधिकारियों को अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण पदों पर भेजा गया है. अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहे संयुक्त निदेशक अरुण कुमार शर्मा को सीआरपीएफ का अतिरिक्त महानिदेशक बनाया गया है जबकि उप महानिरीक्षक मनीष कुमार सिन्हा को ब्यूरो आफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट में भेज दिया गया है.

ब्यूरो आफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट सीधे केंद्र सरकार के तहत आने वाला विभाग है और यह पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए कार्य करता है. चूंकि सिन्हा इससे पहले सीबीआई के अन्दर भ्रष्टाचार के उच्च स्तरीय मामलों की जांच कर रहे थे, इसलिए जानकार मान रहे हैं कि ब्यूरो आफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट उनके पद और अधिकारों के अनुरूप नहीं है.

ठीक इसी तरह सीआरपीएफ के अतिरिक्त महानिदेशक के रूप में अरुण कुमार शर्मा का पद भी उनके द्वारा पूर्व में संभाले गए पद संयुक्त निदेशक की हैसियत के अनुरूप नहीं है.

इन दोनों को ही पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा का करीबी माना जाता है. अरुण कुमार शर्मा ने ही राकेश अस्थाना के खिलाफ रिश्वतखोरी मामले के साक्ष्य दिल्ली हाई कोर्ट में रखे थे. वहीं, सिन्हा सीबीआई के उन अधिकारियों में से थे जिन्हें रातों-रात 23-24 अक्टूबर को सीबाईआई से स्थानांतरित कर दिया गया था.

इस स्थानान्तरण को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि राकेश अस्थाना के खिलाफ चल रही जांच में खुद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने हस्तक्षेप किया था. सिन्हा का यह भी दावा था कि अस्थाना के खिलाफ मामले को रफा-दफा करने के लिए खुद एक केंद्रीय मंत्री ने रिश्वत ली.

जाहिर है कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना करने के बावजूद भी राकेश अस्थाना केंद्र सरकार के चहेते बने हुए हैं. नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस) नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत आने वाला एक स्वतंत्र और विनियामक निकाय है. इसके पास अंतरराष्ट्रीय और घरेलू हवाई अड्डों की सुरक्षा करने जैसे अहम जिम्मेदारी होती है. सवाल है कि क्या ऐसे अहम पद पर किसी ऐसे व्यक्ति को बैठाया जा सकता है जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार के बेहद गंभीर आरोपों में एफआईआर दर्ज हो?


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