लगातार घटते मुनाफे के चलते भारतीय कंपनियों की बिगड़ी ‘बैलेंस शीट’
कॉरपोरेट कमाई में होने वाली कमी का प्रभाव अब भारतीय कंपनियों की बैलेंस शीट और लीवरेज अनुपात (लोन के माध्यम से आने वाली पूंजी, जो कंपनी के लोन स्तर का मूल्यांकन करने के लिए है) पर साफ तौर से देखा जा सकता है.
वित्तीय वर्ष 2019 के दौरान भारत की बड़ी कंपनियों और व्यापारिक समूहों ने अपनी पूंजी और लोन के अनुपात में वृद्धि होने की बात कही है. इसके साथ ही बैलेंस शीट में तीन साल से घट रही कंपनियों की देयता पर पूर्ण विराम लग गया है.
निजी क्षेत्र का लोन-इक्विटी अनुपात (डेब्ट-इक्विटी रेशियो) बीते साल 0.86 की तुलना में वित्त वर्ष 2019 के अंत में 0.88 की दर से बढ़ा है. सम्मिलित रूप से कंपनियों की उधारी 13.2 फीसदी सालाना की दर से बढ़ी है.
ये दर बीते पांच सालों में सबसे अधिक है. कंपनियों के शेयर होल्डरों की इक्विटी 14 फीसदी की वृद्धि दर से गिरकर 12 फीसदी पर आ गई. लोन-इक्विटी अनुपात लेनदारों की पूंजी और मालिकों द्वारा योगदान की गई पूंजी के बीच का अनुपात है.
सरकारी क्षेत्र की 40 सूचीबद्ध गैर-वित्तीय कंपनियों का हाल और भी बुरा है. इनमें ओएनजीसी, एनटीपीसी, पॉवर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, भेल, सेल जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं. इन कंपनियों का डेब्ट-इक्विटी अनुपात 10 आधार अंक बढ़ा है. इस वित्त वर्ष में यह 0.68 के रिकॉर्ड स्तर पर रहा. इनके लिए ये लगातार तीसरा खराब साल है.
2017-18 में सरकारी कंपनियों की सम्मिलित उधारी उनकी कुल संपति में 1.9 फीसदी की वृद्धि के मुकाबले 13.5 फीसदी की दर से बढ़ी थी. इस दौरान उनकी नगदी में 12.8 फीसदी की गिरावट हुई.
आर्थिक विश्लेषक इसके पीछे वृद्धि दर में गिरावट और मुनाफे में कमी को सम्मिलित रूप से जिम्मेदार मानते हैं.
इक्वीनॉमिक्स रिसर्च एंड एडवाइजरी के प्रबंधन निदेशक जी चोक्कालिंगम कहते हैं, “सभी क्षेत्रों में मांग में जबरदस्त कमी देखी गई है. इसकी वजह से व्यापारिक जगत के मुनाफे को क्षति पहुंची है. पूंजी प्रधान क्षेत्रों में इसका असर सबसे ज्यादा देखा जा रहा है. उदाहरण के लिए धातु, ऊर्जा, अवसंरचना और टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है.”
निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी इसका नुकसान उठाना पड़ा है. बीते साल सम्मिलित रूप से इनके मुनाफे में 8.1 फीसदी की कमी देखी गई. ये लगातार दूसरा साल रहा जबकि कमाई में कमी दर्ज की गई.
जानकारों के मुताबिक सरकारी क्षेत्र की कंपनियों नगदी को सबसे ज्यादा नुकसान लाभांश लौटाने और अपने शेयर को फिर से खरीदने (शेयर बायबैक) के चलते हुआ है. वित्त वर्ष 2019 में इनकी नगदी में 12.8 फीसदी की गिरावट हुई.
विश्लेषक कहते हैं कि कर्ज अधिक होने के चलते इन्हें नए सिरे से खर्च करने में मुश्किल हो रही है. इससे रुके हुए निवेश को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा है.
आईडीएफसी के मुख्य अर्थशास्त्री धनंजय सिन्हा कहते हैं, “ज्यादा उधारी होने के चलते कंपनियां खर्च के लिए नए सिरे से कर्ज लेने की स्थिति में नहीं हैं. नगदी प्रवाह और मुनाफे में बढ़ोतरी होने से ही पूंजी में वृद्धि संभव है.”
सिन्हा ने बताया कि इस समय अर्थव्यवस्था में मांग की स्थिति ऐसी नहीं है कि कंपनियां अपनी क्षमता में विस्तार कर सकें.
ये विश्लेषण 782 गैर-वित्तीय कंपनियों के नमूनों पर आधारित है. ये सारी कंपनियां या तो बीएससी-500 या बीएससी मिडकैप और बीएससी स्मालकैप का हिस्सा हैं. इसमें सूचना प्रद्योगिकी और भारतीय कंपनियों की विदेशी शाखाओं को शामिल नहीं किया गया है.
इस विश्लेषण में शामिल ज्यादातर कंपनियों का ऑडिट नहीं हुआ है. ऑडिट के बाद इनके डेब्ट-इक्विटी अनुपात में और वृद्धि हो सकती है.