विदेशी दवा कंपनियों पर मेहरबान मोदी सरकार


drug policy of modi government favouring foreign companies

 

जब देश की सरकार विदेशी कंपनियों को एकाधिकार देने पर तुली हुई हो तो जनता का क्या होगा? जाहिर है कि देश का बाजार विदेशी उत्पादों से भर जाएगा और जनता विदेशी उत्पादों पर निर्भर होती चली जाएगी. ऐसा करने की कोशिश की जा रही है खासकर जीवनरक्षक और आवश्यक दवाओं के क्षेत्र में.

केन्द्र सरकार पिछले कुछ माह से ऐसे कदम उठा रही है जिससे आभास हो रहा है कि विदेशी दैत्याकार दवा कंपनियों को पिछले दरवाजे से देश में घुसकर भारतीय दवा बाजार में एकाधिकार कायम करने का मौका दिया जा रहा है. जाहिर है कि पहले से ही आकाश छूती दवाओं की कीमत और महंगी चिकित्सा से जनता बेहाल है उस पर भारतीय दवा कंपनियों को तवज्जो न देकर विदेशी दवा कंपनियों को वरीयता देने वाली नीति लाने की कोशिश की जा रही है.

हम बात कर रहें हैं केन्द्र सरकार द्वारा भारतीय पेटेंट कानून के नियमों में फेरबदल करने के लिए पेश ‘पेटेंट संशोधन नियम 2018’ के मसौदे की. चूंकि पेंटेंट का विषय अपने आप में ‘कानूनी-तकनीकी’ का मुद्दा है इसलिए इसे सरल रूप में समझने के लिए हम सबसे पहले पीछे की ओर जाएंगे उसके बाद सिलसिलेवार ढंग से आगे बढ़ते हुए आज के ‘पेटेंट संशोधन नियम 2018’ तक पहुंच कर उसका विश्लेषण करेंगे.

क्या होता है पेटेंट

पेटेंट का अर्थ होता है निश्चित अवधि के लिए मिले औद्योगिक एकाधिकार से. यह एकाधिकार बौद्धिक संपप्ति पर दिए जाने के लिए शुरू किया गया था. कुछ शताब्दियों पहले देखा गया कि कोई उस्ताद कारीगर यदि कोई नई चीज बनाता था तो दूसरे लोग उसकी नकल करके वही चीज बना लेते थे. इस वजह से जरूरत महसूस की गई कि आविष्कारकर्ता को उसके आविष्कार पर कुछ समय के लिए एकाधिकार दिया जाए ताकि दूसरे उसका नकल न कर सके. इसके लिए ब्रिटिशकालीन भारत में भी देश की जरूरत के अनुसार 1856 में ‘एक्ट VI’ बनाया गया था.

इसी तरह से दूसरे देशों ने भी अपनी जरूरत के हिसाब से पेटेंट कानून बनाया. इसके बाद 1883 में पेरिस में कई देशों ने सम्मेलन करके ‘पेरिस कन्वेंशन’ की घोषणा की. दुनिया के देश एकजुट हुए थे बौद्धिक संपदा की रक्षा के नाम पर लेकिन जब इस सम्मेलन का अंत ‘पेरिस कन्वेंशन’ के रूप में हुआ तो साफ हो गया कि दरअसल इससे औद्योगिक संपदा की रक्षा की जानी है. यह पेटेंट कानूनों के वैश्वीकरण की पहली कोशिश मानी जाती है. उस समय के परतंत्र भारत सरकार ने भी इस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था.

साल 1911 में ब्रिटिश भारत में पहला पेटेंट कानून बना लेकिन आज़ादी के बाद यह महसूस किया जाने लगा कि देश के विकास की जरूरत के हिसाब से एक नया पेटेंट कानून बनाया जाए. अंतः 1970 में स्वतंत्र भारत में पहला पेटेंट कानून बना जिसे 1972 से लागू किया गया. इसके तहत दवाओं पर प्रोडक्ट पेटेंट की बजाए प्रोसेस पेटेंट अपनाया गया. जिससे दुनिया में आविष्कृत होने वाली नई दवाओं को भारत में किसी दूसरी पद्धति से बनाने की इजाजत दी गई. फलतः 1972 के बाद से देश में नई-नई दवाएं आने लगी जिसका सीधा लाभ मरीजों को हुआ.

डंकल प्रस्ताव और डब्लूटीओ

हालांकि ‘जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड ट्रैरिफ’ याने गॉट के नाम से एक अंतर्राष्ट्रीय मंच बना रहा जहां पर दो देश या कई देश आपस में मिलकर आपसी सहमति से व्यापार और व्यापार शुल्क पर समझौते करते थे. लेकिन इसका कदापि भी यह अर्थ नहीं है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हार मान ली हो.

उन्होंने इसके तत्कालीन प्रमुख ऑर्थर डंकल के माध्यम से 1991 में ‘डंकल प्रस्ताव’ पेश करवा दिया. इस प्रस्ताव के अनुसार इसमें शामिल पेटेंट, कृषि, सेवा और व्यापार शुक्ल की शर्तों को सभी हस्ताक्षरकर्ता देशों को मानना पड़ेगा. इससे पहले कभी भी गॉट में पेटेंट, कृषि और सेवा के क्षेत्र शामिल नहीं थे. कहा जाता है कि डंकल प्रस्ताव में इन मुद्दों को शामिल करवाने के पीछे दवा और कृषि क्षेत्र के दैत्याकार कंपनी फाइज़र और मोंनसांटों का हाथ था.

अंतरराष्ट्रीय दबावों के चलते आखिरकार भारत ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर करके विश्व-व्यापार-संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य बनना मंजूर कर लिया. इस कारण से भारत को अपने पेटेंट कानून में 2005 में बदलाव करना पड़ा. उस लोकसभा में वामपंथ के 61 सदस्य थे. उन्होंने दबाव बनाया कि सरकार विश्व-व्यापार-संगठन के लचीलेपन का फायदा उठाते हुए नया पेटेंट कानून बनाए.

वामपंथी सांसदों के दबाव के आगे तत्कालीन कांग्रेस सरकार को झुकना पड़ा. अंततः दवाओं पर प्रोडक्ट पेटेंट का अधिकार तो दिया गया लेकिन केवल नई दवाओं के लिए ही, और बाजार में उपलब्ध दवाओं को पेटेंट अधिकार से बाहर रखा गया. यदि उस समय सभी दवाओं पर पेटेंट का अधिकार दे दिया गया होता तो दवाएं विदेशी दवा कंपनियों के एकाधिकार में चली गई होती एवं भारतीय दवा कंपनियां उन्हें बनाने और बेचने से वंचित हो जाती. आज की तारीख में भारत में दवाओं पर एकाधिकार प्राप्त करना आसान काम नहीं है.

दबाव की रणनीति

इसका कत्तई भी यह अर्थ नहीं कि बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई हैं. जिस तरह से ‘डंकल प्रस्ताव’ पर हस्ताक्षर करने के लिए विकासशील देशों को विश्व बैंक-अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के कर्जजाल में फंसाकर और अमरीकी सरकार की व्यापार कानून ‘स्पेशल 301’ और ‘सुपर 301’ की धौंस दी गई थी उसी तरह से आज भी कोशिशें जारी हैं कि भारत के पेटेंट कानून और नियमों में ढील दी जाए उनमें विकसित देशों के व्यापार को बढ़ाने के लिए बदलाव किए जाए. इसके लिए अप्रैल 2018 को जारी ‘स्पेशल 301’ में भारत को चीन के साथ उस सूची में रखा जहां अमेरिकी व्यापार को बढ़ाने के लिए कानून और नियमों में बदलाव करवानी है.

उस रिपोर्ट में कहा गया है कि पेटेंट आवेदकों को महंगी और ज्यादा समय लेनी वाली पेटेंट ऑपोजिशन का सामना करना पड़ता है, पेंटेंट मिलने में लंबा समय लगता है और अत्याधिक रिपोर्टिंग का सामना करना पड़ता है. इसी रिपोर्ट में भारत सरकार (पढ़े-मोदी सरकार) की वाहवाही करते हुए लिखा गया है, अमेरिकी सरकार साल 2017 में भारत सरकार के द्वारा उठाए गए इस कदम की सराहना करता है जिसमें भारतीय पेटेंट ऑफिस को विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के केन्द्रीय खोज और परीक्षा के साथ जोड़ा गया है. आशा की जाती है कि भारत रिपोर्टिंग की आवश्यकताओं को और सुस्पष्ट और सुव्यवस्थित करने के लिए कदम उठाएगा!

पेटेंट संशोधन नियम 2018

अब हम सीधे-सीधे ‘पेटेंट संशोधन नियम 2018’ पर आ जाते हैं. इसमें प्रस्तावित किया गया है कि आवेदक भारतीय पेटेंट कार्यालय और दूसरे प्रतिभागी पेटेंट कार्यालय के बीच हुए करार के अनुसार अंतरराष्ट्रीय आवेदन पर कार्यवाही संबंधी व्यवस्था का पात्र है. जिसका अर्थ होता है कि किसी दूसरे देश के पेटेंट ऑफिस से वहां के पेटेंट कानून के अनुसार पेटेंट प्राप्त होने के बाद यदि भारत में भी उसी के आधार पर पेटेंट के लिए आवेदन किया जाए तो उस पर शीघ्रता से कार्यवाही की जाएगी. हालांकि, ‘पेटेंट संशोधन नियम 2018’ के मसौदे में अलग से स्पष्ट किया गया है कि पेटेंट अधिकार मिलने की पात्रता भारतीय पेटेंट कानून के अनुसार ही होगी. अब सवाल किया जाना चाहिए कि जब पेटेंट पाने की पात्रता भारतीय कानून के अनुसार ही होगी तो दूसरे देश में किए गए आवेदन को मान्यता प्रदान करने की कोशिश क्यों की जा रही है.

हमें भूलना नहीं चाहिए कि भारतीय पेटेंट कानून की धारा 3(डी) साल 2005 से विदेशी दवा कंपनियों के आंख में खटक रही है और इसी के कारण ही ‘स्पेशल 301’ की रिपोर्टों में लगातार भारत को चीन के बाद सूची में दूसरे नंबर पर रखा गया है. ऐसे में क्या अगला निशाना धारा 3(डी) है? रणनीति तो यही कहती है कि यदि भारतीय पेटेंट कानून की धारा 3(डी) को बचाना है तो किसी दूसरे देश के माध्यम से पेटेंट फाइलिंग की कोशिश को रोकना होगा.

पेटेंट प्रासीक्यूशन हाइवे

यहां पर इस तथ्य का भी उल्लेख किया जाना चाहिए कि कुछ ही समय पहले भारत और जापान के प्रधानमंत्रियों ने ‘द्विपक्षीय पेटेंट प्रासीक्यूशन हाईवे’ (पीपीएच) को साल 2019 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू करने का निर्णय लिया है. जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बौद्धिक संपदा की सुरक्षा मिल सके. इस कार्यक्रम के तहत जापानी कंपनियों के पेटेंट आवेदन पर शीघ्रता से कार्यवाही होने की पात्रता होगी.

यहां पर सवाल किया जाना चाहिए कि जब भारतीय पेटेंट कानून के अनुसार पेटेंट पाने की पात्रता ही नहीं होगी तो उसके आवेदन पर शीघ्रता से विचार क्यों किया जाए. अमरीकी दवा कंपनियां और यूरोप के अन्य विकसित देश भी जापानी रूट से भारत में पेटेंट के लिए आवेदन कर सकेगी. कुल मिलाकर पेटेंट प्रासीक्यूशन हॉईवे भारत को अपने देश की जरूरत के हिसाब से कानून बनाने से रोकेगी.

पेटेंट की अवधारणा सही या गलत

अब हम एक बार पेटेंट की अवधारणा पर विचार कर लेते हैं. पेटेंट का अर्थ नई खोज या आविष्कार पर नियत समय के लिए दिए जाने वाले एकाधिकार से है. आविष्कार या खोज किस आधार पर होती हैं. विज्ञान के आधार पर ही की जाती है. सब जानते हैं कि विज्ञान अपने आप में क्रमबद्ध ज्ञान है. गणित के नए सूत्र पुराने सूत्र के आधार पर ही निकाले जाते हैं.

यदि किसी नई जीन की खोज की जाती तो वह पुराने जीव-विज्ञान के आधार पर ही की जाती है. यदि किसी नई दवा का आविष्कार किया जाता है तो क्या उसके लिए रसायनशास्त्र और भौतिकी के पुराने नियमों का उपयोग नहीं किया जाता है. इस तरह से कोई भी नई खोज या आविष्कार अपने आप में संपूर्ण मानवजाति की संपदा है न कि किसी एक की बौद्धिक संपदा है. इस बौद्धिक संपदा को हासिल करने के लिये पुराने कई बौद्धिक संपदा का उपयोग किया जाता है.

शून्य का आविष्कार भारत में हुआ था. क्या आज दुनियाभर में जितनी बार शून्य का उपयोग किसी गणना में किया जाता है उतनी बार भारत को उस पर रायल्टी दी जायेगी? अमरीका की खोज कोलंबस ने की थी. तो क्या अमरीका पर कोलंबस के वंशजों का अधिकार होगा? जाहिर है कि पेटेंट की अवधारणा ही अपने आप में गलत है.

कॉरपोरेट की सरकार

इस लंबी यात्रा के बाद आप ‘पेटेंट संशोधन नियम 2018’, जापान के साथ ‘द्विपक्षीय पेटेंट प्रासीक्यूशन हाईवे’, अमेरिकी ‘स्पेशल 301’ की रिपोर्ट को जोड़कर देखें तो साफ हो जाएगा कि विदेशी दवा कंपनियों को देश के दवा बाजार में एकाधिकार पाने के लिए घुसपैठ की इजाज़त दी जा रही है.

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में यह संभव नहीं हुआ था इसीलिए कॉरपोरेट घराने उनकी सरकार पर ‘पॉलिसी पैरालाइसिस’ का आरोप लगाते रहें हैं तथा उन्होंने साल 2014 के चुनाव में सत्ता परिवर्तन के लिए पूरा जोर लगा दिया था. लेकिन कॉरपोरेट मोदी सरकार पर ‘पॉलिसी पैरालाइसिस’ का आरोप नहीं लगाते हैं. आखिर लगाए भी क्यों सब कुछ तो उनके मनमाफिक हो रहा है.


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