किसान-मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ दो दिनों की आम हड़ताल


farmer organisation goes for bharat bandh on 8-9 january

 

बीजेपी की अगुआई वाली केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ देशभर के किसान एकजुट हो रहे हैं. देश के अलग-अलग किसान संगठनों ने ऑल इंडिया किसान सभा के नेतृत्व में 8 से 9 जनवरी को दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल की घोषणा की है. किसान संगठनों के साथ ही ट्रेड यूनियन भी दो दिन की हड़ताल करने जा रही हैं.

किसान संगठन ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ ने बीते 18 दिसंबर को हुई एक बैठक में दो दिवसीय ग्रामीण भारत बंद बुलाया था. ऑल इंडिया किसान सभा के अध्यक्ष अशोक धावले ने कहा, “ग्रामीण भारत बंद और ट्रेड यूनियन हड़ताल उद्योगपतियों की समर्थक और जन विरोधी बीजेपी सरकार के खिलाफ किसानों और मजदूरों को एकजुट करेगी.”

भूमि अधिकार सभा ने भी इस बंद का समर्थन करने का फैसला किया है. भूमि अधिकार सभा कई ऐसे संगठनों का समूह है, जो गरीब भूमिहीन किसानों के लिए जमीन की मांग करते हैं. अशोक धावले ने बताया कि बंद सरकार की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति का भी विरोध करेगी.

सीपीएम से संबंधित ऑल इंडिया किसान सभा के महासचिव हन्नान मुल्ला ने कहा, ‘‘एआईकेएस और भूमि अधिकार आंदोलन 8-9 जनवरी को ‘ग्रामीण हड़ताल’, रेल रोको और मार्ग रोको अभियान चलाएगा. इसी दिन ट्रेड यूनियन राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल का आयोजन कर रहे हैं.”

उन्होंने कहा कि यह कदम ग्रामीण संकट से जुड़े मुद्दों से निपटने और ग्रामीण किसानों की जमीनों को उद्योगपतियों से बचाने में मोदी सरकार की नाकामी के खिलाफ उठाया गया है. सीपीएम की किसान शाखा के नेता अतुल कुमार अंजान ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों के प्रति अपनी निराशा जताने और राष्ट्रव्यापी हड़ताल को सफल बनाने के लिए किसान सड़क जाम करेंगे और प्रदर्शनों में शामिल होंगे.’’

इस हड़ताल में दस ट्रेड यूनियनों आईएनटीयूसी, एआईटीयूसी, एचएमएस, सीटू, एआईयूटीयूसी, एआईसीसीटीयू, यूटीयूसी, टीयूसीसी, एलपीएफ और सेवा शामिल होंगी. देश इस समय गंभीर कृषि और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है. देश का 50 फ़ीसदी किसानों और खेतों में काम करने वाले मजदूरों की हालत बहुत खराब है, लेकिन सरकार की ओर से उन्हें बहुत थोड़ी मदद ही मिली है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2013 से 2016 के बीच 48 हजार से अधिक किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की है. लेकिन सरकार की ओर से मदद के बजाय ऐसी नीतियां बनाई गई जिनसे बड़ी कंपनियों को फायदा हुआ. किसानों की समस्या कम होने के बजाय बढ़ती ही गई.

मशहूर पत्रकार और कृषि समस्याओं के जानकार पी. साईनाथ कहते हैं, “भारत की कृषि समस्या खेती से परे जा चुकी है. अब यह समाज की समस्या बन चुकी है. इससे भी आगे ये पूरी सभ्यता की समस्या है. शायद इस समय दुनिया का सबसे बड़ा छोटे किसानों का जनसमूह अपने जीवन-यापन के लिए संघर्ष कर रहा है.”

बीते एक साल में देश किसानों के तीन बड़े आंदोलनों का गवाह बन चुका है. अगस्त, अक्टूबर और नवंबर में दिल्ली में हुए इन प्रदर्शनों में पांच लाख से ज्यादा किसानों ने किसान विरोधी सरकारी नीतियों के खिलाफ आंदोलन किया.

बीजेपी सरकार के 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही मजदूरों से संबंधित कानूनों को ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर लगातार खत्म किया जा रहा है. ट्रेड यूनियन इसको लेकर विरोध जताती रही हैं. उनका कहना है कि अगर लगातार ऐसा चलता रहा तो इसका व्यापक विरोध होगा.

नवंबर 2017 में तीन लाख से अधिक कामगारों ने मजदूर अधिकारों के हनन के विरोध में महापड़ाव आयोजित कर विरोध जताया था.

बीते 28 नवंबर को हुई बैठक में राष्ट्रव्यापी हड़ताल की घोषणा करते हुए 12 सूत्रीय मांगपत्र सौंपा गया था. इस मांगपत्र में श्रमिक कानूनों को लागू करने की बात कही गई है. इसमें इन कानूनों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की गई है.

मजदूर संगठनों की मांग हैं कि न्यूनतम वेतन 18 हजार रुपये से कम नहीं होना चाहिए. इसमें समान कार्य के लिए समान वेतन की भी मांग की गई है. इस मांगपत्र में रोजगार सृजन के लिए बुनियादी कदम उठाने की बात कही गई है.


Big News