RCEP के लिए भारत को उद्योग जगत का समर्थन हासिल करना होगा: ऑस्ट्रेलियाई उच्चायुक्त
भारत में ऑस्ट्रेलिया की उच्चायुक्त हरिंदर सिद्धू ने कहा है कि आरसीईपी की सफलता के लिए भारतीय उद्योग को राजी करने की राजनीतिक इच्छा होना जरूरी है.
आसियान समूह के देशों की अगुआई में 16 देशों के बीच क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौते पर बातचीत चल रही है. ये समझौता इन देशों के बीच मुक्त व्यापार के रास्ते खोलेगा. अगर ये समझौता हो जाता है तो ये विश्व की आधी आबादी और एक तिहाई जीडीपी का प्रतिनिधित्व करेगा.
दि हिंदू में छपे साक्षात्कार के मुताबिक जब हरिंदर से पूछा गया कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मुक्त व्यापार समझौते के लिए 2011 से बातचीत चल रही है, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक परिणाम देखने को नहीं मिला है. क्या अब इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मैं ऐसा नहीं कह सकती हूं, मैंने आर्थिक रिश्तों में बेहतरी देखी है. सीईए हमारे लिए हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन अब हमने अपनी समझ को विस्तार देना शुरु किया है.
उन्होंने कहा कि द्विपक्षीय समझौते हमारे लिए हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं. अब ऑस्ट्रेलिया की सरकार भारतीय आर्थिक रणनीति को समर्थन दे रही है और भारतीय सरकार भी इससे प्रभावित है. सरकार इसके लिए अध्ययन करवा रही है कि किस तरह से दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी हो सकती है.
सिद्धू सीईसीए के मुद्दे पर कहती हैं कि ऐसे समझौतों में वक्त लगता है और मुझे लगता है कि हमारे रिश्तों में हमेशा ही कुछ ना कुछ असहमति रहती ही है.
हिंदू ने जब हरिंदर से पूछा कि आरसीईपी जैसे बहुपक्षीय समझौते में दोनों देश पक्ष हैं. क्या योजना के मुताबिक इस साल इसमें कुछ प्रगति देखने को मिल सकती है?
इस पर उन्होंने कहा कि मेलबोर्न में हुई पिछली बैठक के बाद से हमें इस साल के अंत तक इसके पूरे होने की उम्मीद है. इसमें ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों देशों की ओर से सकारात्मक चीजें देखने को मिली थीं. उन्होंने कहा कि बैठक से पहले मैंने पीयूष गोयल को उद्योगपतियों से बात करते हुए देखा था. इस समझौते को लेकर दोनों पक्षों से स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं.
जब उनसे कहा गया कि उद्योगपतियों से परामर्श के बाद इंडियन इंडस्ट्री ने जो बयान जारी किया वो इस समझौते के लिए नकारात्मक था. ऐसे में आपको लगता है कि क्या राजनीतिक अवरोध खत्म होंगे?
इस पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इसका जवाब भारत सरकार को देना है. व्यापार समझौते हमेशा लाभ को संतुलित करने और व्यापार जगत की चिंताओं को ध्यान में रखकर किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि ये एक पक्षीय नहीं होते.
उन्होंने कहा कि मुझे पूरी उम्मीद है कि भारत सरकार उद्योग जगत को इसके लिए राजी कर रही है कि ये समझौता उनके लिए अच्छा होगा और इससे कई देशों के बाजार तक उनकी पहुंच सुनिश्चित होगी.
हिंदू की ओर से उनसे पूछा गया कि यहां बहुत सारे संगठन एफटीए का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि अब तक हुए किसी भी एफटीए से भारत को फायदा नहीं पहुंचा है. ऐसी परिस्थिति में आरसीईपी कैसे संभव हो पाएगा?
इसके जवाब में हरिंदर ने कहा कि एक व्यापार समझौता तब तक अच्छे परिणाम नहीं देता जब तक आप ठीक से उसका उपयोग ना करें. बहुपक्षीय समझौते में लाभ गई गुना हो जाते हैं. किसी भी देश की तरह भारतीय समझौता करने वाले लोग अपने देश की बेहतरी सोचेंगे. उन्होंने कहा कि इस बारे में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा व्यापारिक पहुंच को बढ़ाना है, ताकि समझौते से फायदा उठाया जा सके.
जब हरिंदर से पूछा गया कि अगर भारत सरकार इस पर असहमति को दूर करने में असफल रही, तो क्या भारत के बगैर आरसीईपी को आगे ले जाया जाएगा?
इस पर उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया का मानना है कि भारत और चीन दो इस क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और इनकी उपस्थिति आरसीईपी के लिए ये बहुत जरूरी है. उन्होंने कहा कि किसी भी देश के इससे अलग होने पर हमें निराशा होगी खासकर भारत के. हम भारत को इससे अलग नहीं देखना चाहते. हम इसको लेकर भारत की वकालत करेंगे.
सिद्धू ने कहा, मैंने भारत सरकार से इस समझौते के फायदों को लेकर काफी बातचीत की है.