जब बादशाह खान ने आलोचकों को सत्याग्रह के मायने समझाए
खान अब्दुल गफ्फार खान (बादशाह खान उर्फ बाचा खान) का जन्म छह फरवरी 1890 को पाकिस्तान के खैबर पख्तुनवाह के उत्मान जई के एक जमींदार परिवार में हुआ था.

उनकी मृत्यु 97 साल की उम्र में 20 जनवरी 1988 को पेशावर में हुई थी. वो गांधीजी के विचारों से काफी प्रभावित थे और आज़ादी के आंदोलन में उन्होंने गांधीजी की तरह ही सत्य और अहिंसा के सिद्धांत को अपनाया था.

इन्हीं वजहों से उन्हें लोग सीमांत गांधी के नाम से भी पुकारते थे. वो भारत और पाकिस्तान के विभाजन के खिलाफ थे लेकिन उनके पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था.

आज़ादी के बाद वो पहली बार भारत 1969 में गांधी स्मारक निधि के आमंत्रण पर आए थे. यह गांधीजी का जन्मशताब्दी वर्ष था. यह तस्वीर तब की ही है. इस मौके पर एक अक्टूबर को दिल्ली के एयरपोर्ट पर उनकी अगुवाई करने तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पहुंची थीं. इस मौके पर जयप्रकाश नारायण भी साथ थे.

इस मौके पर उन्होंने कहा था कि मैं यहां जो आया हूँ, महात्मा गांधी ने जो आपको सबक दिया था उसकी याद दिलाने आया हूँ.

जब खान अब्दूल गफ्फार खान ने सत्याग्रह की बात करनी शुरू की थी तब लोगों ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा था कि देखिए ये गांधी के रास्ते पर चल रहे हैं तब उन्होंने अपने आलोचकों को जवाब दिया था कि पैगंबर मोहम्मद पर मदीना से 100 किलोमीटर दूर एक गांव ताईफ में पत्थर मारे जा रहे थे तो उन्होंने जवाब नहीं दिया था और कहा था कि मैं सब्र कर रहा हूँ. यह भी तो सत्याग्रह ही था.
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