मध्य प्रदेश डायरी: राजनीतिक गलियारों में चुनावी खींचतान


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टिकट पाने के घमासान में विरोध की नूराकुश्ती

लोकसभा चुनाव के पहले मध्य प्रदेश में दिलचस्प राजनीतिक समीकरण देखने को मिल रहे हैं. बतौर प्रत्याशी बीजेपी या कांग्रेस के उम्मीदवार से मुकाबला तो बाद में होगा, पहले अपनी ही पार्टी में टिकट दावेदारों से दो-दो हाथ करना पड़ रहा है. जिनसे साथ की उम्मीद थी वे लोग ही विरोध में उतर आए.

ऐसा ही अप्रत्याशित वाकया बीजेपी प्रदेश चुनाव समिति की बैठक में हुआ. भीतर बैठक चल रही थी और बाहर के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह को टिकट देने का विरोध हो गया.

पार्टी के वरिष्ठ नेता ही नहीं कार्यकर्ता भी हैरान थे कि चौहान के रिश्तेदार ने ही अपनी भाभी को टिकट दिए जाने का विरोध करते हुए नारे लगाए. बाद में यह अनुमान भी लगाया गया कि यह विरोध सुनियोजित हो सकता है ताकी विदिशा लोकसभा सीट से शिवराज सिंह चौहान परिवार के अलावा किसी और की दावेदारी ना हो सके और पैनल में कोई नाम ना जाए. हुआ भी यही समिति ने कोई पैनल तय न करते हुए विदिशा से प्रत्याशी का निर्णय हाईकमान पर छोड़ दिया.

किसान मुद्दे पर आक्रामक बीजेपी बैकफुट पर

मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी के टिकट वितरण के साथ ही चुनावी गतिविधियां तेज हो गई हैं. लेकिन किसानों के मुद्दे पर एक दिलचस्प मोड़ आ गया है. अब तक जहां बीजेपी किसान कर्ज माफी के नाम पर कांग्रेस को घेर रही थी और आरोप लगा रही थी कि कमलनाथ सरकार का यह वचन कोरा साबित हुआ है. वादा 2 लाख तक का कर्जमाफी का था मगर, सरकार ने किसानों को प्रक्रिया में उलझाए रखा और खाते में कर्ज माफी का पैसा नहीं भेजा.

इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर आक्रामक हुई बीजेपी अब बैकफुट पर दिखाई दे रही है. आचार संहिता के कारण किसानों के खाते में सम्मान निधि का पैसा नहीं पहुंच पाया है और इस कारण कांग्रेस को पलटवार का मौका मिल गया है.

दरअसल, मोदी सरकार ने मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित सात राज्यों के किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की पहली किस्त जल्द देने का वादा किया था. लेकिन आचार संहिता लागू होने तक किसानों के खाते में पैसा नहीं पहुंचा. सफाई में, अब बीजेपी कह रही है कांग्रेस सरकार द्वारा समय पर किसानों की सूची न देने के कारण किसानों का डेटा वेरीफाई करने में देरी हुई है. जाहिर है, किसान कर्जमाफी पर बीजेपी उतनी आक्रामक नहीं हो पा रही है.

चर्चा में रहा मुख्यमंत्री का कॉरपोरेट अंदाज

मुख्यमंत्री कमलनाथ के मध्य प्रदेश में सक्रिय होने के साथ ही उनकी कॉरपोरेट शैली भी चर्चा के केंद्र में आई है. कांग्रेस के होली मिलन समारोह का आयोजन भी इसी शैली के कारण चर्चित हुआ.

आमतौर पर कार्यकर्ताओं की भीड़, हंगामा, विवाद कांग्रेस कार्यक्रमों की पहचान हुआ करते हैं. मगर इस बार होली मिलन में ऐसा कुछ नहीं था. मिंटो हॉल जैसे सितारा आयोजन स्थल पर पत्रकारों के साथ होली मिलन कॉरपोरेट अंदाज में व्यवस्थित था. कोई हड़बड़ी नहीं, कोई रेलमपेल नहीं. मुख्यमंत्री ने पत्रकारों के सभी सवालों के भले जवाब न दिए मगर उन्हें पर्याप्त समय दिया और व्यक्तिगत मुलाकात की.


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