आधार आर्थिक हो तो आरक्षण में मुसलमानों की दावेदारी सबसे मजबूत


Reserved seats is the hurdle behind Muslim representation: Report

 

आर्थिक आधार पर 10 फ़ीसदी आरक्षण देने के लिए संसद में लाया गया संविधान संशोधन विधेयक पास हो गया है. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ये कानून का हिस्सा हो जाएगा.

इसका उद्देश्य गरीब सवर्णों को आरक्षण देना बताया जा रहा है. लेकिन सरकार का कहना है कि इस आर्थिक आरक्षण के तहत पहले से आरक्षण का लाभ ले रहे तबकों को छोड़कर बाकी सभी को शामिल किया जाएगा. इसका सीधा सा मतलब है कि इसमें मुस्लिमों और ईसाइयों को भी हिस्सेदारी मिलेगी.

इस कदम के पीछे सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं. सवाल वाजिब भी हैं, आखिर सरकार को चार साल सात महीनें बाद इन गरीबों की याद क्यों आई? खैर अभी हम मिंट वेबसाइट के लेख के आधार पर गरीबों की पहचान और आरक्षण में मुसलमानों की हिस्सेदारी पर बात करेंगे.

इसको लेकर अगर सरकार की इच्छा गरीब तबकों को मुख्य धारा में लाने की है. तो इसके सबसे बड़े हकदार मुसलमान होने चाहिए. कम से कम गरीबी और पिछड़ेपन के आंकड़े तो यही कहानी बयान कर रहे हैं.

मोदी सरकार की ओर से जो विधेयक पास कराया गया है, उसके मुताबिक आठ लाख तक की पारिवारिक आमदनी वाले परिवार इसके जद में आएंगे. इसके अलावा ऐसे परिवार जिनके पास पांच एकड़ से अधिक भूमि है या नगरपालिका क्षेत्र में सौ यार्ड का प्लॉट है. गैर नगरपालिका क्षेत्र में दो सौ वर्ग यार्ड तक के प्लॉट वाले परिवार गरीबी रेखा में नहीं आएंगे.

देश में औसतन ऊपर के एक फ़ीसदी लोग ही 8 लाख से ऊपर के खांचे में आते हैं. ऐसे में गरीबी की इस सीमा में देश का एक बड़ा हिस्सा आएगा.

‘इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे’ और मेरीलैंड के एक विश्वविद्यालय ने 2011-12 में एक संयुक्त सर्वे किया था. इस सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक देश के प्रत्येक परिवार की औसतन वार्षिक आय एक दशमलव 13 लाख रुपये है. इन्हीं आंकड़ों के मुताबिक एससी और एसटी परिवारों की वार्षिक आय सबसे कम है. इसके बाद नंबर आता है मुसलमान परिवारों का और इसके बाद ओबीसी हैं.

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़े कहते हैं कि सवर्ण परिवार देश के सबसे संपन्न परिवारों की श्रेणी में आते हैं. इनकी पारिवारिक आय देश के बाकी परिवारों की औसत वार्षिक आय के लगभग डेढ़ गुनी है.

सर्वे के मुताबिक सिर्फ तीन फ़ीसदी ग्रामीण परिवार ऐसे हैं जिनके पास पांच एकड़ से अधिक भूमि है. मुसलमानों के मामले में तो ये आंकड़ा महज एक फ़ीसदी है.

नितिन कुमार भारती पेरिस स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स के शोध छात्र हैं. नितिन ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों को लेकर विस्तृत अध्ययन किया है. इस अध्ययन में इन्होंने पाया कि मुसलमान भारत में सबसे गरीब तबका है.

मोदी सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए जो मानक रखे हैं उनके अनुसार आरक्षण में पहली दावेदारी मुसलमानों की होगी. लेकिन उपलब्ध संसाधनों की बात करें तो ये बहुत थोड़े हैं. इनमें अगर मुसलमानों को अगड़े हिंदुओं से प्रतिस्पर्धा करना पड़ा तो शायद वो खुद को सबसे पीछे पाएं.


Big News