अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर दुविधा में होगी नई सरकार


new indian government might be stuck in dilemma on macro economics

 

बीजेपी की अगुआई में एनडीए ने राजनीतिक लड़ाई में आसान जीत दर्ज करा ली है, लेकिन अगर मोदी सरकार का इरादा अर्थव्यवस्था को संकट से बाहर निकालने का है तो यहां कई मोर्चों पर कठिन लड़ाई लड़नी होगी.

बीते कुछ महीनों से उपभोक्ता आधारित अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट हो रही है, साथ ही व्यापार घाटा भी लगातार बढ़ता जा रहा है. अंग्रेजी अखबार लाइव मिंट कुछ सूचकों के माध्यम से लगातार इस पर नजर रख रहा है. मिंट कुल 16 सूचकों पर प्रति महीने आधारित आंकड़ों के माध्यम से नजर रख रहा है.

इन 16 सूचकों में से सिर्फ पांच सूचक ऐसे हैं जो ठीक कहे जा सकते हैं. जबकि सात सूचक खतरे के निशान के पार चल रहे हैं. इनमें से सबसे बड़ी चिंता का कारण उपभोक्ता अर्थव्यवस्था बनी हुई है. जहां मांग लगातार घटती जा रही है. एक ओर वाहनों की बिक्री गिर रही है तो दूसरी ओर हवाई यातायात भी घटता जा रहा है. उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी इसी तस्वीर की ओर इशारा कर रही हैं.

एक ओर घटती मुद्रास्फीति को उपभोक्ताओं के नजरिए से अच्छा माना जाता है. वो इस तरह से कि चीजें सस्ती हो जाती हैं. तो दूसरी ओर ये उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता कम होने की ओर इशारा करती है. जिसका अर्थव्यवस्था पर बहुत विपरीत असर पड़ता है. ये अर्थव्यवस्था को अनिवार्य रूप से मंदी की ओर ले जाती है.

बीते कुछ महीनों में खुदरा महंगाई ठीक रही है, लेकिन फिर भी खाद्य और ईंधन जैसी चीजों में मुद्रास्फीति औसत से ज्यादा रही है. ग्रामीण क्षेत्र में आय में कम वृद्धि की वजह से मांग लगातार कमजोर रही है.

उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में कमी के चलते बड़ी कंपनियां भी प्रभावित हुई हैं. रेटिंग एजेंसी आईसीआरए में सूचीबद्ध कंपनियों के राजस्व में लगातार गिरावट देखी गई.

इस दौरान रेल भाड़ा और कोर सेक्टर की ग्रोथ (ऊर्जा, कोयला आदि) भी खतरे के निशान के आस-पास रही.

कुछ समय के लिए अर्थव्यवस्था को गति देने के बाद कच्चे तेल के महंगे होने के चलते अप्रैल महीने से देश का व्यापार घाटा कुल व्यापार के अनुपात में बढ़ने लगा. जिससे निर्यात में वृद्धि भी कम हो गई.

भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के चलते तेल के दामों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है. इसका सीधा मतलब होगा कि देश का राजस्व और चालू खाते का घाटा लगातार दबाव में बना रहेगा.

कुल मिलाकर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत नजर नहीं आ रहे हैं. ये आने वाले वित्त मंत्री के लिए नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं. आने वाली सरकार के सामने राजस्व घटने के बावजूद अर्थव्यवस्था में सुधार करने की चुनौती भी होगी.

कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक राजस्व घाटे के लक्ष्य पहले की तरह ही बड़े रखे जा सकते हैं. इस दौरान भारत सरकार का अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने पर जोर रहेगा ना कि अपने राजस्व खातों को दुरुस्त रखने पर. इससे खपत में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे औद्योगिक उत्पादन भी बढ़ सकता है.

लेकिन ये रास्ता खतरों से भरा हुआ है. पहला खतरा तो महंगाई का अधिक बढ़ जाना है, जिसे बड़ी मुश्किल से अब तक नियंत्रण में रखा गया था. दूसरा ये कि इससे सरकारी देनदारी बहुत बढ़ जाएगी, जिसकी वजह से घरेलू अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को झेलने के लिए कमजोर हो जाएगी.

ये सब कुछ ऐसी स्थितियां हैं, जहां सरकार के सामने दुविधा होगी कि वो कौन सा कदम उठाए.


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