निकट भविष्य में अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के आसार नहीं
लगातार मंद पड़ती जा रही भारतीय अर्थव्यवस्था के गति पकड़ने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं. मिंट मैक्रो ट्रैकर ने जून महीने के दौरान घरेलू मांग के अधिकतर सूचकों के खतरे के निशान के ऊपर रहने पर यह निष्कर्ष निकला है.
मिंट मैक्रो ट्रैकर पिछले साल अक्टूबर में लॉन्च हुआ था. यह तब से 16 मैक्रोइकॉनमिक सूचकों के आधार पर हर महीने अर्थव्यवस्था की सेहत के बारे मे जानकारी दे रहा है. इस साल जून में इन 16 सूचकों में सात हरे, सात लाल और दो पीले निशान पर रहे.
पिछली मई में आठ सूचक लाल निशान पर थे. लेकिन मार्च अप्रैल में छह सूचक लाल निशान पर थे.
जून महीने में अगर बात करें तो यात्री वाहन बिक्री, ट्रैक्टक बिक्री, दोपहिया वाहन बिक्री, घरेलू हवाई यात्री, रेल फ्रेट ट्रैफिक, ट्रेड बैलेंस और ग्रामीण इलाकों में भत्ता जैसे सूचक लाल निशान पर रहे. वहीं कोर ग्रोथ, बैंक्स नॉन फूड क्रेडिट, रुपया बनाम डॉलर, करेंट अकाउंट बैलेंस, कन्ज्यूमर प्राइस इंडेक्स, कोर कन्ज्यूमर प्राइस इंडेक्स और जॉब ऑउटलुक जैसे सूचक हरे निशान पर रहे. इंपोर्ट कवर और पीएमआई मैन्युफैक्चरिंग सूचक पीले निशान पर रहे.
मई के मुकाबले जून में अर्थव्यवस्था में थोड़ा सुधार हुआ है और यह सुधार करेंट अकाउंड बैलेंस पर ताजा डेटा आने के बाद हुआ है. करेंट अकाउंट बैलेंस मार्च महीने में समाप्त हुई तिमाही में बुरी तरह से गिर गया था.
वहीं औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े सूचकों ने मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है. हालांकि, एनबीएफसी सेक्टर के तनाव और कमजोर मांग के चलते इन सूचकों पर आने वाले समय में नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. ऑटो सेक्टर को ऋण देने वाले अभी से इस ओर सावधान हो गए हैं.
इस बीच महंगाई नियंत्रण में बनी हुई है. कोर इन्फ्लेशन दो साल के अपने सबसे निचले स्तर पर है. इससे भी उपभोग की मांग में कमी का पता चलता है. वहीं ग्रामीण क्षेत्र में रहने वालों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है. ग्रामीण क्षेत्र का भत्ता पिछले दो सालों से लाल निशान पर है. इस साल औसत से नीचे मानसून इस स्थिति को और भी अधिक बिगाड़ सकता है.
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बढ़ने और देश में निवेश के पिछले 15 साल के निचले स्तर पर रहने से पता चलता है भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिख रहा है.