टीबी नहीं, खराब गुणवत्ता वाला खाना है बड़ा खतरा


No TB, poor quality food is big danger

 

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जन स्वास्थ्य को जितना खतरा मलेरिया, टीबी और खसरा जैसी बीमारियों से नहीं है. उससे कहीं अधिक खतरा खाने की खराब गुणवत्ता से है. पूरे विश्व में पांच में से एक मौत किसी न किसी रूप में अपर्याप्त पोषक आहार से संबंधित है.

यह किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक समस्या है. सबसे ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इस समस्या की वजह खाने की कमी नहीं है. सच तो ये है कि विश्व में मांग से अधिक खाने का उत्पादन होता है.

एक अनुमान के मुताबिक पूरे विश्व में करीब तीन अरब लोग पोषक आहार से वंचित रह जाते हैं. अब जो अगला सवाल जेहन में आता है वो ये है कि फिर ये खाना जाता कहां हैं?

इस सवाल का जवाब खाद्य और कृषि संगठन की एक रिपोर्ट में मिलता है. खाद्य और कृषि संगठन, संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अंग है, जिसे एफएओ के नाम से जाना जाता है. एफएओ की इस रिपोर्ट के मुताबिक हर साल करीब 1.3 अरब मिट्रिक टन खाद्य पदार्थों का उत्पादन होता है. इसमें से एक तिहाई कभी लोगों के खाने की प्लेट तक नहीं पहुंचता.

ये पोषक खाना किसी न रूप में बर्बाद हो जाता है. अगर ये खाना बर्बाद होने से पहले लोगों के पेट तक पहुंच जाये तब ये स्वास्थ्य के लिए तो हितकर होगा ही साथ ही अनमोल प्राकृतिक संसाधनों जैसे ऊर्जा, पानी और जमीन को अनावश्यक रूप से खर्च होने से बचायेगा.

पूरी आहार श्रृंखला में जितना खाना बर्बाद होता है उसमें से आधा पोषक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें फल, सब्जी सूखे मेवे आदि आते हैं. बर्बाद होने वाले खाने का एक तिहाई अनाज के रूप में होता है. मांस आदि का हिस्सा 25 फीसद के बराबर है. और करीब 30 फीसद समुद्री भोजन बर्बाद होता है.

एफएओ के रिपोर्ट में विकसित और कम आय वाले देशों में खाने के बर्बादी की वजहों के बारे में भी बताया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक कम आय वाले देशों में उगाने, भंडारण करने और लाने-ले जाने खाने का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद होता है. विकसित देशों में उपभोग के स्तर पर खाने की बर्बादी अधिक होती है.

रिपोर्ट के मुताबिक हर साल बर्बाद होने वाले खाने की कीमत करीब एक ट्रिलियन डॉलर के बराबर है. अगर पोषक खाने को इस तरह से बर्बाद होने से बचाया जा सके तो इससे न सिर्फ पोषण को बढ़ावा मिलेगा बल्कि अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.

अगर भारत की बात की जाये तो इसने आजादी के बाद आर्थिक मोर्चे पर भले ही कुछ बेहतर तस्वीर पेश की है. लेकिन कुपोषण आज भी भारत के लिए भी एक गंभीर समस्या है. भारत की गिनती उन देशों में होती है, जहां बच्चों की बड़ी संख्या गंभीर रूप से कुपोषण का शिकार है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक भारत के 38.4 फीसद बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कद में छोटे हैं। 21 फीसदी बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं.


Big News