छत्तीसगढ़ : सरकार के बोल और आंकड़ों की हकीकत


Chhattisgarh: Seven Naxalites killed in police encounter

 

विधानसभा चुनाव के दौर से गुजर रहे छत्तीसगढ़ की गणना देश के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित राज्यों में होती है. सरकारी आंकड़ो के मुताबिक छत्तीसगढ़ के आठ जिले नक्सल प्रभावित हैं.

बीजेपी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि राज्य में नक्सली संगठनों की कमर तोड़ दी गई है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने तो हाल ही में दिए अपने चुनावी भाषण में खुद ही अपनी पीठ ठोंक ली. अमित शाह ने माओवादी घटनाओं को काबू करने की बात कहते हुए इसे बीजेपी की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया. हालांकि ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है.

संसद के मानसून सत्र में एक सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय राज्य गृह मंत्री हंसराज अहीर ने दावा किया किया था कि अब सिर्फ देश के 30 जिले नक्सल प्रभावित हैं. इस साल अप्रैल में केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौबा ने भी माओवादियों पर काबू पाने का दावा किया था.

उनके मुताबिक ऐसा केंद्र सरकार की सिक्योरिटी रिलेटेट एक्सपेंडीचर (एसआरई) योजना के कारण हुआ. इस योजना के तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में संचार साधनों के विकास और आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के लिए भत्तों आदि का बंदोबस्त किया जाता है. इसके अतिरिक्त माओवाद प्रभावित इलाकों में तैनात सुरक्षा बलों और पुलिस थानों के लिए भी आर्थिक सहायता दी जाती है. इसके लिए केंद्र सरकार राज्यों को धन का आवंटन करती है.

अगर इस योजना पर गौर करें तो ये अपनी तरह की नई योजना नहीं है. यूपीए के शासनकाल में इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान नाम से ऐसी योजना चलाई जा रही थी. बीजेपी सरकार ने बस इतना किया है कि इसका नाम बदलकर एसआरई कर दिया है.

यूपीए सरकार ने अपने शासन काल में ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू किया था. इसके तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी. बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने अर्धसैनिक बलों की संख्या में और इजाफा कर दिया.

इन सबके बावजूद अगर सिर्फ छत्तीसगढ़ में नक्सली घटनाओं पर नजर दौड़ाएं तो इसमें कमी के कोई लक्षण नजर नहीं आते. पिछले छह सालों से तुलना करें तो साल 2017 में छत्तीसगढ़ ने सबसे अधिक हिंसक घटनाओं का सामना किया. इसके लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं है.

गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक 2012 में माओवादी घटनाओं में 109 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2013 में 111, 2014 में 112, 2015 में 101, 2016 में 107 लोगों ने अपनी जान खोई थी. 2017 में मरने वालों की 130 पर जा पहुंची. ये आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि सरकारें माओवादियों पर नियंत्रण करने में पूरी तरह से नाकामयाब रही हैं.

इस दौरान सुरक्षाबलों को भी बुरी तरह से क्षति पहुंची है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में 48 जवानों ने माओवादी घटनाओं में अपनी जान से समझौता किया था. 2016 में ये संख्या कम होकर 38 पर आ गई. लेकिन 2017 में 60 सुरक्षाकर्मियों ने माओवादी हमलों में अपनी जान गंवाई.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने हाल ही में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि उनकी सरकार 2022 तक राज्य से लाल आतंक खत्म कर देगी. रमन सिंह के मुताबिक उनकी सरकार केंद्र के साथ मिलकर इससे निजात पाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के आर्थिक विकास की बात भी कही थी.

केंद्र की बीजेपी सरकार पिछली यूपीए सरकार की तुलना में खर्च में इजाफा करने की बात भी कहती रही है. एक नजर आंकड़ों पर दौड़ाएं तो ये बात कुछ हद तक सही भी नजर आती है. 2010 और 2014 के बीच इस मद में कुल 875 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे. जबकि 2014-2018 के दौरान ये आंकड़ा 1,121 करोड़ पर जा पहुंचा.

इन सबके बीच एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है. ये कुछ ऐसा है कि आपको दायें हाथ में चोट लगी हो और पट्टी आपके बाएं हाथ में बांध दी जाए. आंकड़ों के मुताबिक 2014-2018 के बीच माओवादी घटनाओं पर नियंत्रण के लिए केंद्र की ओर से उत्तर प्रदेश को 349 करोड़ रुपए दिये गए. जबकि इसी दौरान छत्तीसगढ़ को सिर्फ 53 दशमलव 71 करोड़ रुपए की सहायता राशि दी गई. जबकि गृह मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में बीते चार साल से कोई माओवादी घटना नहीं हुई है.

रमन सिंह अक्सर ये कहते हुए सुने जाते हैं कि नक्सली समस्याओं से निजात पाने में बजट कोई समस्या नहीं है. लेकिन उनकी खुद की पार्टी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के बजट आवंटन पर गौर करें तो पुलिस आधुनिकीकरण में भी छत्तीसगढ़ दूसरा सबसे कम धनराशि पाने वाला राज्य है.

अब जबकि छत्तीसगढ़ में पहले दौर का मतदान हो चुका है. माओवादियों की वोट ना डालने की अपील के बाद भी जिस तरह से 70 फ़ीसदी मतदाताओं ने अपने मतों का प्रयोग किया उससे ये साफ होता है कि आम लोग विकास चाहते हैं. लोग पहले भी लोकतंत्र पर भरोसा दिखाते रहे हैं. सरकारें किस हद तक लोगों का भरोसा जीत रही हैं इस बात में संशय हो सकता है.


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