क्या हुआ गन्ना किसानों से मोदी-योगी के वायदों का?


maharashtra's agriculture growth will slow down by eight percent

 

“एक जमाना था कि इस इलाके को धान का कटोरा कहा जाता था, लेकिन भाइयों-बहनों लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था-जय जवान-जय किसान. गन्ने की खेती करने वाले मेरे भाई बताओ कि क्या कहीं जय किसान नजर आता है? कहीं किसान के जय की संभावना दिखती है क्या? इन्होंने कभी किसान का जय किया है क्या? अरे गन्ना किसान को पैसे तक नहीं दे पाते. वो जय जवान-जय किसान का नारा कैसे बोल सकते? इनका तो नारा है मर जवान-मर किसान. युद्ध में जितने जवान मरे हैं, उससे ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है.”

नरेन्द्र मोदी, लोकसभा चुनाव 2014 में लखीमपुर-खीरी में दिए गए भाषण का अंश

“सबसे बड़ा जिला. चीनी का कटोरा कहा जाने वाला ये मेरा लखीमपुर. हमारे किसानों का पसीना मीठा हो जाता है. स्वीट हो जाता है. ऐसे गन्ने की ताकत है यहां, लेकिन भाइयों-बहनों गन्ना किसानों का बकाया चुकता करने में अखिलेश आपको कौन रोकता है. गन्ने की खेती करने वाला हर किसान बोलता है कि आपने उसके हक को छीना है. क्या यही आपका काम बोलता है. भाइयों-बहनों मैं उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी को बहुत हृदय से बधाई देना चाहता हूं कि इस चुनाव में उसने अपने संकल्प पत्र में आपको वादा किया है कि भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश में सरकार बनने के बाद 14 दिन में, दो सप्ताह में गन्ना किसानों का बकाया चुकता कर दिया जाएगा.”

नरेन्द्र मोदी, उप्र विधानसभा 2017 के चुनाव में लखीमपुर-खीरी में दिए गए भाषण का अंश

“राजनीति का आधार किसान बनना चाहिए. किसानों की आय यूपी में सबसे पहले दोगुनी होगी और राजनीति का आधार जाति नहीं गांव, किसान और जवान होगा. हम 30 जनवरी तक गन्ना किसानों का पिछला बकाया और अब 14 दिन का भुगतान कराकर ही रहेंगे.”

योगी आदित्यनाथ, 6 जनवरी 2018 को मेरठ की एक जनसभा में दिए गए भाषण का अंश

ऊपर दिए गए तीन उद्धरण देखकर लगता है कि लोकसभा चुनाव, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव व उसके कुछ दिन बाद तक बीजेपी नेताओं की मुख्य चिंता गन्ना किसानों के बकाए भुगतान को लेकर थी. उन्हें रात-दिन किसानों की तकलीफ परेशान करती थी. इसके लिए वे तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार को कोसते थे और अपनी सरकार बनने पर 14 दिन के अंदर भुगतान देने की बात कहते थे. किसानों ने उनकी बातों पर यकीन किया. उनकी झोली वोटों से भर दी. पहले देश और फिर प्रदेश में ऐतिहासिक बहुमत से सरकार बनवा दी, लेकिन सरकार बनने के बाद बीजेपी किसानों के बजाय चीनी मिलों के पाले खड़ी होती दिखी.

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहने लगे कि किसान इतना गन्ना बोता क्यों है? उन्होंने 11 सितम्बर 2018 को बागपत की रैली में किसानों को यह तक सलाह दे डाली कि गन्ना नहीं सब्जी उगाओ. अच्छे से बेचो. मुनाफा कमाओ. इसके लिए दिल्ली की बाजार का रास्ता भी बता दिया. मुख्यमंत्री की सलाह यहीं तक सीमित नहीं रही. वह इससे आगे बढ़ते हुए कहने लगे कि किसान इतना गन्ना लगा दे रहे हैं कि लोगों को शुगर की बीमारी हो जा रही है.

मुख्यमंत्री की सलाह उसी तरह से है कि चीनी मिलन से जीत न पावैं-किसानन पर जोर चलावैं. योगी का मशविरा मानकर अगर किसान गन्ना उगाना बंद कर दें. उसकी जगह सब्जी उगाने लगें तो क्या सरकार उन्हें लाभ की गारंटी देगी? इसका जवाब है नहीं, क्योंकि सब्जियों को सुरक्षित रखने और मंडी तक पहुंचाने का अभी तक ढांचा नहीं बन पाया है. कुछ जगह बना भी है तो वह बेहद कमजोर है. बताते हैं कि देश में हर साल 92 हजार करोड़ रुपए के फल और सब्जियां रखरखाव की उचित व्यवस्था न होने से खराब हो जाती हैं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय मोदी कहते थे कि चीनी खा-खा कर लोग मोटे हो जाएं, लेकिन मेरा गन्ने का किसान वैसे का वैसा रह जाए ये स्थिति अब नहीं चलेगी. गन्ना किसानों को पाई-पाई दिलाएंगे. मुख्यमंत्री ने 11 सितम्बर को बागपत में कहा था कि चीनी मिलों ने अगर 15 अक्टूबर तक बकाए का भुगतान नहीं किया तो मिल मालिकों पर डंडा चलेगा.

गन्ना विकास मंत्री सुरेश राणा का कहना था कि राज्य सरकार सुनिश्चित करेगी कि अक्टूबर 2018 में पेराई आरंभ होने से पहले किसानों को उनके गन्ने का पुराना बकाया चुका दिया जाए. ये नेता सभाओं में चाहे जो कहें लेकिन उनके जेहन में किसान कम मिल मालिकान ज्यादा रहते हैं. इसका उदाहरण पेराई सत्र 2017-18 (अक्टूबर-सितम्बर) है, जिसमें पूरे सीजन के दौरान किसानों को लगभग नहीं के बराबर भुगतान किया गया. मिल मालिकान रोना रोते रहे कि बाजार में चीनी की कीमत बहुत नीचे है. इसलिए वह किसानों का बकाया नहीं चुका पा रहे हैं. सवाल उठता है कि जब 2007-08 में चीनी के दाम 16 रुपए किलो से 40 रुपए किलो तक चढ़ गए थे तो क्या मिलों ने समय से भुगतान कर दिया था? मिल मालिक चीनी की कीमत चढ़ती है तब भी समय से भुगतान नहीं करते और जब गिरती है तब तो नहीं ही करते.

गत अक्टूबर-नवम्बर में सबसे अधिक उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर 11,618 करोड़ रुपये बकाया थे. इसमें से कुछ भुगतान किया है, लेकिन अगला सीजन शुरू होने के बावजूद अभी पिछले सत्र का काफी कुछ भुगतान बकाया है. इसको लेकर जिलों में आए दिन धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं. इसी आठ जनवरी को किसानों ने हरिद्वार-मुरादाबाद रेल ट्रैक जाम किया.

उनकी मांग थी कि पिछले सत्र का बकाया भुगतान सहित नए सत्र का 14 दिन के अंदर भुगतान कराया जाए. किसानों के बकाए की जमीनी स्थिति जानने के लिए प्रदेश के लखीमपुर-खीरी जिले के खमरिया निवासी पत्रकार रमेश मिश्र की ‘हिन्दुस्तान’ अख़बार में 16 नवम्बर 2018 को प्रकाशित एक खबर का जिक्र करना आवश्यक है, जिसमें उन्होंने बताया कि पिछले सत्र का किसानों का करीब 11 अरब (10 अरब 67 करोड़ 90 लाख 24 हजार रुपए) रुपया जिले की नौ चीनी मिलों पर बकाया है.

बीजेपी ने 14 दिन के अंदर भुगतान का जो वादा किया था, वह बात गन्ना एक्ट के दस्तावेजों में भी है, जिसके मुताबिक किसानों को 14 दिन के भीतर चीनी मिल से भुगतान मिलना चाहिए. अगर इस नियम को वह लागू नहीं कर पाते तो 14 से 16 प्रतिशत की दर से ब्याज देना होगा, लेकिन ब्याज की कौन कहे यहां किसानों को अपना मूल ही मिल जाए वही बहुत है.

ऊपर जैसा बताया गया है कि सरकारों को किसानों की अपेक्षा मिलों की चिंता अधिक रहती है. इस चिंता को केन्द्र में रखकर वह फैसले भी लेती हैं. मोदी सरकार ने चीनी उद्योग के लिए जून 2018 में 8500 करोड़ रुपए का पैकेज दिया, जो मुख्य रूप से इथेनॉल क्षमता को बढ़ावा देने के लिए था. तत्पश्चात सितम्बर 2018 में 5538 करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान किया, जिसके तहत 2018-19 में चीनी मिलों को 50 लाख टन चीनी निर्यात करने के लिए परिवहन सबसिडी और गन्ना उत्पादकों के लिए उत्पादन सहायता राशि शामिल थी.

योगी सरकार ने किसानों का बकाया चुकाने के लिए मिलों को 1010 करोड़ रुपये का पैकेज दिया. साथ ही बकाएदार चीनी मिलों को 4000 करोड़ रुपये का सॉफ्ट लोने देने को मंजूरी दी तो पेराई सत्र 2017-18 में खरीदे गए गन्ने पर साढ़े चार रुपये प्रति क्विंटल सबसिडी देने का भी फैसला किया. सवाल उठता है कि जनता के ही चार हजार करोड़ रुपए कम ब्याज पर मिलों को देकर जनता की मदद करना कौन सी बड़ी बात है. बार-बार इस तरह की दरियादिली दिखाकर क्या सरकार यह मानती है कि मिलें घाटे में चल रही हैं अथवा मिल मालिकों के आगे सरेंडर करके वह किसानों के हित की बात करती है. यही ‘हित’ उससे सलाह दिलवाता है कि किसान गन्ने का उत्पादन कम करके सब्जी का उत्पादन करें. ऐसी सलाह देते हुए वह भूल जाती है कि आगरा में आलू किसानों के साथ क्या हो रहा है. लहसुन और टमाटर उगाने वाले किसानों की क्या लागत निकल पा रही है.

पिछले कुछ वर्षों से गन्ना उत्पादित राज्यों में गन्ने की खेती बढ़ी है. इसमें उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है. दूसरे और तीसरे नंबर पर क्रमशः महाराष्ट्र और कर्नाटक हैं. लेकिन सरकारें ही नहीं प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता भी गन्ना किसानों की समस्याओं से साबका नहीं रखते. उत्तर प्रदेश के जिलेवार स्थानीय नेताओं (सांसद, विधायक, पूर्व विधायक, दलों के जिलाध्यक्ष आदि) को गन्ने की खेती में कोई परेशानी नहीं होती. लखीमपुर-खीरी जिले में हर नेता का भुगतान सबसे पहले होता है. उसके पास गन्ना सप्लाई करने वाली पर्चियों का कोई संकट नहीं होता. वह जितनी पर्चियां चाहता है मिल और सोसाइटी उसकी मुराद पूरी करती हैं. मिलों और सोसाइटियों के ओबलाइज करने के कारण नेता किसानों के पक्ष में खड़े नहीं होते.

किसान मिल, सोसाइटी से लेकर नेताओं तक के चक्कर लगाते रहते हैं. धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं, लेकिन किसी के कानों पर जूं नहीं रेंगती. मिलों, सोसाइटियों, नेताओं और दलालों का गिरोह काम कर रहा है. इस गिरोहबाजी में फर्जी रकबा दिखाकर हजारों फर्जी सट्टे बनते हैं. हजारों-लाखों पर्चियों के जरिए करोड़ों का कारोबार होता है और आम किसान एक-एक पर्ची को तरसता है. इसका उदाहरण लखीमपुर-खीरी जिले की सबसे लेटलतीफ तीन दिसम्बर को पेराई शुरू करने वाली गोविन्द शुगर मिल्स लिमिटेड ऐसा भी है, जहां दिसम्बर अंत तक एक पर्ची 10 से 12 हजार रुपये में बिक रही थी. इस तरह की अनेक चीनी मिलों में सट्टों के जरिए फर्जीवाड़ा हो रहा है.

इंडिया टुडे हिंदी में 14 नवम्बर 2018 को प्रकाशित आशीष मिश्र की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘फैजाबाद में हुए गोपनीय सर्वे में गन्ना विभाग ने बड़े पैमाने पर सट्टे में हेरफेर पकड़ा है. यहां 800 से अधिक सट्टे बोगस पाए गए हैं जिनमें कुल 87 हेक्टेयर रकबा दर्ज है. इन बोगस सट्टों में बीते पेराई सत्र में करीब 50 हजार कुन्टल से अधिक गन्ने की आपूर्ति हुई है.’

प्रदेश सरकार मौजूदा सत्र में चीनी मिलें समय से चलवाने में भी असफल रही. सरकार ने पहले अक्टूबर अंत तक सभी मिलों में पेराई शुरू करने की समय सीमा तय की थी. इस समय सीमा में राज्य की कुल 119 चीनी मिलों में से बमुश्किल एक दर्जन ही चल सकीं. खेतों में खड़े गन्ने या छीले हुए गन्ने को सूखता देख किसानों ने आक्रोश जाहिर किया. मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर सहित अनेक जगह प्रदर्शन कर मिलों को तत्काल चालू करने की मांग की. गन्ना विकास मंत्री एक बार फिर दावा करते नजर आए कि नवम्बर में सभी मिलें चालू हो जाएंगी, लेकिन उनसे कौन पूछे कि राज्य की अनेक मिलें उनके दावों पर पानी क्यों फेरती हैं? मिलों के चलने में देरी होती है तो रबी की प्रमुख फसल गेहूं प्रभावित होती है.

गन्ना किसान पेड़ी लगाकर गेहूं की बुआई करता है, लेकिन मिलें नवम्बर अंत अथवा दिसम्बर में चलेंगी तो वह गेहूं कैसे बोएगा. कृषि विभाग बताता है कि गेहूं की बुआई हर हाल में 20 नवम्बर तक हो जानी चाहिए. अन्यथा मार्च और अप्रैल में पछुआ हवा चलेगी तो गेहूं की फसल सूखने का खतरा रहेगा. सवाल इस बात का है कि जब 20 नवम्बर तक गन्ना (पेड़ी) वाले खेत ही नहीं खाली होंगे तो किसान गेहूं कैसे बोएगा. अगर उसे गेहूं बोना है तो अपना गन्ना औने-पौने दाम पर क्रेशर अथवा गुड़ बनाने वाले कोल्हू पर बेचना पड़ेगा, जो छोटे अथवा मध्यम वर्गीय किसान बड़े पैमाने पर बेच भी रहे हैं. दरअसल चीनी मिलें सरकार से रियायत मिलने की आस में जान-बूझकर पेराई सत्र शुरू करने में देरी करती हैं. वे सोचती हैं कि सत्र शुरू करने में देरी होगी तो किसान परेशान होगा. वह शोर-शराबा करेगा तो मिल मालिकों को अप्रत्यक्ष रूप से सरकार पर दबाव बनाने का मौका मिलेगा. वैसे भी सरकारें दबाव में आने के लिए तैयार ही रहती हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)


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