बीजेपी की संभावनाओं से डिगता भरोसा


bjp may end up cutting tickets of one third sitting mps

 

प्रशांत किशोर अब राजनेता हैं. इसलिए अब उनके आकलन को शायद लोग उतना वजन ना दें जैसा पहले देते थे, जब उनकी पहचान चुनाव रणनीतिकार की थी. क्योंकि अक्सर राजनेता आकलन हकीकत के मुताबिक नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के फायदे और नुकसान को ध्यान में रखते हुए सामने रखते हैं.

मगर एक अंग्रेजी अखबार के साथ बातचीत में किशोर ने मौजूदा राजनीतिक हालात और 2019 के आम चुनाव की संभावनाओं के बारे में जो बातें कहीं, उससे लगता है कि सियासी मजबूरियों के बावजूद उनका खरापन अभी गायब नहीं हुआ है और इससे जो तस्वीर उभरती है, वह उनकी पार्टी (जनता दल-यू) के सहयोगी दल (भारतीय जनता पार्टी) के लिए चिंताएं बढ़ाने वाली हैं.

निष्कर्ष यह है कि आज जो हालत दिख रहे हैं (या मीडिया जैसी सूरत दिखा रहा है) सच्चाई वैसी नहीं है. प्रशांत किशोर के इन शब्दों पर गौर कीजिए, “सत्ताधारी दल से जुड़ा एक पहलू भय का भी है. इसकी वजह से कोई उसके बारे में नकारात्मक बातें कहना नहीं चाहता. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि लोग उसके खिलाफ वोट भी नहीं डालेंगे.”

प्रशांत किशोर से सवाल यह पूछा गया था कि क्या आपको “शक्तिशाली” बीजेपी के 272 से ज्यादा सीटें जीतने की संभावना दिखती है. पहले इसके कारण बताने के बाद प्रशांत किशोर ने अपना निष्कर्ष इस रूप में बताया, “मेरी राय में बीजेपी सबसे आगे है. लेकिन यह कहना गलत होगा कि उसे कोई चुनौती नहीं है या वह अगले चुनाव में स्वीप करने जा रही है. अगर मैं बीजेपी में होता, तो ऐसी (प्रचलित) भावनाओं के कारण आशंकित होता.”

तो वे भावनाएं या कारण क्या हैं, जिनकी वजह से प्रशांत किशोर को भाजपा बहुमत की तरफ बढ़ती नहीं दिखती? क्या बीजेपी को बहुमत मिलेगा, इस प्रश्न के उत्तर की शुरुआत किशोर ने इस रूप में की, “यह बहुत कठिन है. इस बात का संबंध नेता या कार्यकर्ताओं से नहीं है, ना ही इसका संबंध विपक्ष के कमजोर या मजबूत होने से है. देश में 70 फीसदी लोग रोजाना 100 रुपए भी नहीं कमा पा रहे हैं. उन लोगों के मन को भांप पाना बहुत मुश्किल है. उन लोगों की कोई आवाज नहीं है. हम जैसे लोग जो आमजन के मूड का आकलन करने में लगे होते हैं, वे ज्यादातर उन लोगों की भावनाओं को ही पकड़ पाते हैं जिनके पास आवाज है. देश में तकरीबन 70-80 करोड़ लोग आवाज-विहीन हैं. अगर उनके पास आवाज हो, तो भी यह जरूरी नहीं है कि वे राजनीतिक बहस-मुबाहिशे में शामिल हों। इसीलिए अक्सर चुनाव नतीजे हैरतअंगेज होते हैं. ऐसे आवाज़-विहीन लोग जिंदगी के संघर्षों में उलझे हुए हैं वे चुनाव अभियानों की ज्यादा चिंता नहीं करते. फिर गरीब लोग भले अपने सियासी विचार जाहिर ना करते हों, लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता कि उनके पास राजनीतिक विचार हैं ही नहीं.”

इस बात को प्रशांत ने दो-टूक में कही है कि 2014 जैसी लहर पैदा करना अब नरेंद्र मोदी के लिए बहुत मुश्किल होगा. आम तौर पर ज्यादातर निष्पक्ष पर्यवेक्षक भी आज इसी राय के हैं. लेकिन इन बातों का प्रशांत किशोर के मुंह से कहा जाना अहम है.

इसका संकेत है कि सहयोगी दल भी आज बीजेपी की चुनावी संभावनाओं को लेकर आशंकित हैं. इसके संकेत रामदास अठावले जैसे नेताओं के बयान से भी मिला है.

अठावले ने कहा है कि वे फिलहाल हवा का रुख भांप रहे हैं. आगे वे इसके मुताबिक ही फैसला करेंगे कि उन्हें बीजेपी के साथ रहना है या कांग्रेस के साथ जाना है. शिवसेना, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के रुख भी यही बताते हैं कि आज बीजेपी की संभावनाएं उसके सहयोगी दलों की नजर में संदिग्ध हैं. क्या इसके बावजूद सचमुच बीजेपी नेताओं का भरोसा नहीं डोल रहा है?


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