ऑटो उद्योग क्यों कर रहा है परेशानी का सामना?


reasons behind automobile sector crisis

 

मौजूदा स्थिति : ऑटो उद्योग में मंदी लगातार नौवें महीने भी रही. जुलाई महीने में सभी वाहनों की बिक्री 18.71 फीसदी गिरकर 18 लाख 25 हजार इकाई रही. जबकि बीते साल जुलाई महीने में 22 लाख 45 हजार वाहन बेचे गए थे. यह पिछले 19 साल में सबसे बड़ी गिरावट रही.

बीते साल अक्टूबर के बाद से ही वाहनों की बिक्री में गिरावट का सिलसिला जारी है. तमाम कोशिशों के बाद भी ऑटो उद्योग बिक्री में लगातार आ रही गिरावट से निकलने में नाकामयाब रहा है. निर्माताओं की उपभोक्ताओं को लुभाने की तमाम कोशिशें विफल रही हैं.

इस बीच मांग और आपूर्ति में तालमेल बैठाने के लिए कई निर्माताओं ने परिचालन बंद किए. वहीं इस बीच क्षेत्र में मंदी की मार के चलते करीबन दो लाख 15 हजार कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है.

ऑटोमोबाइल क्षेत्र को हुआ क्या है?

द हिंदू की खबर के मुताबिक 2018-19 वित्त वर्ष की पहली तिमाही में ऑटो उद्योग 18 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सभी श्रेणियों में 70 लाख से ज्यादा गाड़ियां बेची गईं.

इस तिमाही में यात्री वाहनों की बिक्री में 20 फीसदी, व्यावसायिक वाहनों की बिक्री में 51.55 फीसदी और दोपहिया वाहनों की बिक्री में 16 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

हालांकि घरेलू यात्री वाहनों की बिक्री सबसे पहले जुलाई 2018 में नीचे गई थी. इसके बाद केरल में बाढ़ और विभिन्न राज्यों में भारी बारिश के चलते अगस्त और सितंबर में मांग में तेजी नहीं आ सकी.

स्टॉक क्यों बढ़ा?

आगे आने वाले महीनों में तेल के दामों में बढ़ोतरी, ऊंची ब्याज दर और वाहन बीमा लागत में बढ़ोतरी के चलते कन्ज्यूमर सेंटिमेंट लगातार कमजोर हुआ. बीते साल त्योहारों के मौसम में भी स्थिति नहीं बदली और विक्रेताओं के पास वाहनों का स्टॉक लगातार बढ़ता गया.

साल के अंत में आईएलएंडएफएस मामले के चलते नकदी का संकट खड़ा हो गया. जिसके बाद उपभोक्ताओं और विक्रेताओं के पास नकद की कमी हो गई.

ग्रामीण क्षेत्र में वाहन बाजार को नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों से वित्तीय मदद मिलती है. क्योंकि त्योहारों में भी मांग में सुस्ती रही इसलिए विक्रताओं के सामने कार्यशील पूंजी का संकट खड़ा हो गया है.

इन सभी कारणों के चलते व्यावसायिक समेत सभी वाहनों की बिक्री दिसंबर महीने से ऋणात्मक रही.
चुनाव का साल था ऐसे में पूर्व इतिहास को देखते हुए ऑटो उद्योग इस उम्मीद में था कि आगे आने वाले महीनों में ब्रिकी बढ़ेगी. हालांकि अब चुनावों के बाद भी स्थितियां बेहतर होती हुई नहीं दिख रही है.

क्या लोग टाल रहे हैं वाहनों की खरीदारी?

संभावनाएं हैं कि उपभोक्ता बीएस VI यानी भारत स्टेज VI वीइकल एमिशन स्टैंडर्ड वाली गाड़ियों का इंतजार कर रहे हों. 1 अप्रैल 2020 से भारत में बीएस VI वाहन ही बेचे जाएंगे ऐसे में अधिक छूट के इंतजार में भी वो अपने फैसले को टाल सकते हैं.

कई ऑटो उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार इलेक्ट्रॉनिक वाहनों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही है, ये देखते हुए भी ग्राहक पेट्रोल और डीजल गाड़ियों को खरीदने का फैसला टाल सकते हैं.

कितने लोगों ने गवाईं नौकरी?

ऑटो मोबाइल क्षेत्र देश में सबसे अधिक नौकरी मुहैया कराने वाले क्षेत्रों में से एक है. इस क्षेत्र में करीबन तीन करोड़ 70 लाख लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से काम करते हैं.

वाहनों की मांग में गिरावट का प्रभाव उत्पादन और नौकरियों पर पड़ा है.

ताजा आंकड़ों के मुताबिक ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (ओईएम) बीते दो से तीन महाने में 15 हजार से अधिक अस्थायी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल चुका है. कार्यशील पूंजी की कमी और मांग में कटौती के बीच देश भर में 300 से अधिक डीलरशिप बंद हुईं.

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (एफएडीए) के मुताबिक इसकी वजह से दो लाख लोगों की नौकरी चली गई.

ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसीएमए) ने जुलाई में चेतावनी दी कि क्षेत्र में 10 लाख से अधिक नौकरियों पर खतरा है. एसोसिएशन ने कहा कि ऑटो क्षेत्र को दोबारा पटरी पर लाने के लिए तत्काल कार्यवाही की जरूरत है.

क्यों है मौजूदा मंदी?

एडलवाइस रिसर्च ने जानकारी दी है कि ऑटो क्षेत्र का मौजूदा संकट पहले से अलग है. पहला ये कि, क्षेत्र में सुस्ती के लिए एनबीएफसी का संकट जैसे घरेलू कारण जिम्मेदार हैं. जबकि इससे पहले उद्योग में सुस्ती अंतरराष्ट्रीय कारणों से रही थी.

उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2019-21 के बीच सुरक्षा, बीमा और उत्सर्जन संबंधी अनुपालन लागत के चलते वाहनों की कीमत में 13-30 फीसदी का उछाल आएगा.

अंतिम उपभोक्ताओं के लिए दामों में इतनी अधिक वृद्धि, विकास में बाधा का काम कर सकती है. इसके अलावा पुरानी कारों के बढ़ते बाजार से मिल रही प्रतियोगिता के कारण भी नई गाड़ियों की बिक्री कम हुई है.

उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 2019 में नई यात्री वाहनों का बाजार जहां 2 फीसदी की तेजी से बढ़ा रहा था, वहीं पुराने यात्री वाहनों के बाजार में 10 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई.

ऑटो क्षेत्र को किसकी है जरूरत?

वाहन उद्योग नए लॉन्च और आकर्षक ऑफर्स के बाद भी ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर सका है. ऐसे में लगातार नीचे जा रही मांग को बढ़वा देने लिए जरूरी है कि सरकार दखल दे.

विनिर्माण जीडीपी में वाहन क्षेत्र का योगदान लगभग आधे के बराबर है. साथ ही इस क्षेत्र की जीएसटी राजस्व में करीबन 11 फीसदी की भागीदारी है.

ऑटो उद्योग को भरोसा है कि त्योहार के मौसम से पहले सरकार रिवाइवल पैकेज से क्षेत्र को बढ़ावा देने की कोशिश करेगी. क्षेत्र की मांग है कि जीएसटी 28 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किया जाए. त्योहारों से पहले ऐसा करने से दाम सीधे तौर पर नीचे जाएंगे और कम समय में ही मांग में उछाल देखने को मिलेगा.

इसके साथ ही एनबीएफसी संकट से निपटने, इलेक्ट्रिक वाहनों पर सरकार की नीति स्पष्ट करने और व्‍हीकल स्‍क्रैप पॉलि‍सी की मांग की गई है. इन कदमों से वाहनों की मांग में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी. कुछ समय पहले हुई एक बैठक के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन को इन सभी मांगों से अवगत कराया गया था.

कब तक रहेगी ऑटो उद्योग में मंदी

द हिंदू लिखता है कि 1 अप्रैल 2020 से भारत में बीएस VI वाहन ही बेचे जाएंगे, ऐसे में वाहनों के दाम बढ़ सकते हैं. पेट्रोल वाहनों के दामों में 20,000 से 50,000 की वृद्धि हो सकती है जबकि डीजल वाहनों के दामों में एक से डेढ़ लाख रुपये ऊपर जा सकते हैं.

ऐसे में आगे वाहनों के दामों में अंतर को देखते हुए बीएस VI वाहनों की मांग पर भी असर पड़ सकता है.


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