सरकार की विनिवेश नीति की वजह से टॉप पीएसयू का कर्ज बढ़ा, कमाई घटी


Coal India workers strike on 24 September to protest against FDI

 

देश की इंन्फ्रास्ट्रक्चर की रीढ़ समझे जानेवाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) की हालत पिछले पांच साल में लगातार खराब हुई है. ज्यादातर गैर वित्तीय पीएसयू कम मांग या सरकार के विनिवेश कार्यक्रम की वजह से वित्तीय संकट में हैं.

जानकारों के मुताबिक सरकार पीएसयू के विनिवेश को बढ़ावा दे रही है और बड़े पीएसयू पर घाटे में चल रही अन्य सार्वजनिक कंपनियों की हिस्सेदारी सरकार से खरीदने का दबाव है. इसके साथ ही उच्च लाभांश भुगतान की स्थिति बनी हुई है. उच्च लाभांश भुगतान का अर्थ है कि पीएसयू निवेश के बजाय अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्से शेयर होल्डर में बांट रहे हैं.

पिछले पांच साल में पीएसयू के पास उपलब्ध नगदी में बड़ी मात्रा में कमी आई है. लाभ में कमी की वजह से पीएसयू अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा अपने शेयर होल्डर को दे रहे हैं या शेयर धारकों से दोबारा खुद ही शेयर खरीद रहे हैं. इन सबकी वजह से पीएसयू का कर्ज लगातार बढ़ रहा है.

पिछले पांच साल में देश के सबसे बड़े 10 पीएसयू का कुल कर्ज बढ़कर कुल संपत्ति का 40 फीसदी तक पहुंच गया है. मार्च 2014 के अंत में यह 4,38,000 करोड़ रुपये था जो कि मार्च 2019 में बढ़कर 6,15,000 करोड़ रुपये हो गया है.

इसी समय अवधि में पीएसयू पर शुद्ध कर्ज बढ़कर दोगुना हो गया है. यह पांच साल की तुलना में 2,65000 करोड़ रुपया से बढ़कर 5,33,000 करोड़ हो गया है. पांच साल पहले कर्ज 0.47 की तुलना में 0.77 की गति से बढ़ रहा है.

ओएनजीसी का सकल कर्ज पिछले पांच साल में दोगुना से अधिक बढ़ा है. मार्च 2014 में 49,000 करोड़ रुपया से बढ़कर मार्च 2019 में 1,07000 करोड़ रुपया हो गया है.

एचपीसीएल में विनिवेश के बाद ओएनजीसी पर 28,191 करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज हो गया है.  यह ओएनजीसी के कुल कर्ज का 26 फीसदी है.

वित्त वर्ष 2019 के अंत तक ओएनजीसी की नगदी और उसके समकक्ष की राशि में 21 फीसदी की कमी आने के बाद यह 12, 893 करोड़ रुपये रह गया है.

पिछले पांच साल में ओएनजीसी का सकल कर्ज चार गुणा बढ़कर 24,000 करोड़ रुपया से 95,000 रुपया हो गया है.

ओएनजीसी के संकट में आने की मुख्य वजह एचपीसीएल को सरकार से खरीदना रहा है. एचपीसीएल में 51.1 फीसदी की हिस्सेदारी के लिए ओएनजीसी को कर्ज चुकाने के लिए 24,991 करोड़ रुपया और अन्य मद में 11,924 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े.

तेल उद्योग के जानकारों का कहना है कि तीन चाल साल पहले तक ओएनजीसी के पास 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की नगदी (कैश रिजर्व) थी. साल 2017 में ओएनजीसी ने गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन से केजी बेसिन गैस ब्लॉक को 7,740 करोड़ रुपये में खरीदा.
इसके बाद जीएसपीसी और एचपीसीएल के बीच सौदा हुआ. यहीं से ओएनजीसी का कर्ज बढ़ता गया है.

जानकारों के मुताबिक ओएनजीसी का कारोबार बड़ा है जिसकी वजह से इसका बहुत बड़ा प्रभाव देखने को नहीं मिल है लेकिन एक अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड(सीआईएल) की हालात ज्यादा खराब हो चली है.

पिछले पांच साल में सीआईएल का कैश रिजर्व और मार्केट कैप घटने के साथ कंपनी पर कर्ज बढ़ा है.  मार्केट कैप का अर्थ कंपनी के सभी शेयरों का कुल मूल्य होता है.

कंपनी की वित्त वर्ष 2018-19 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक मजदूरी में वृद्धि, सप्लाई चेन में देरी, नए कोल खदानों को खोलने का बढ़ता खर्च और विस्थापन खर्च में बढ़ोत्तरी की वजह से पहले ही कोल इंडिया वित्तीय संकट में है. इसके बावजूद सरकार की ओर से वित्त वर्ष 2018 और 2019 में कंपनी को दो बार शेयर बायबैक करने को कहा गया है. इसके एवज में केन्द्र सरकार को 3,287 करोड़ रुपये मिले हैं.

इसके साथ ही भेल और सेल की रेवेन्यू और लाभ में कमी की वजह से बाजार में उसकी उपस्थिति घटी है. लगातार चार साल से भेल का कारोबार एक लाख करोड़ रुपये पर ठहरा हुआ है. वित्त वर्ष 2019 में कंपनी की मांग में 70 फीसदी तक कमी आई है.

आईडीएफसी सिक्युरिटी की जुलाई रिपोर्ट में कहा गया है कि भेल की बाजार में देर से एंट्री हुई है जिसकी वजह से वह बाजार में पकड़ नहीं बना पाया है.

इसके साथ ही पिछले पांच साल में अन्य पीएसयू के नेट डेब्ट(शुद्ध कर्ज) में तेजी से वृद्धि हुई है. पिछले पांच साल में एनटीपीसी का नेट डेब्ट 160 फीसदी, स्टील ऑथरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड का नेट डेब्ट 100.4 फीसदी, पॉवर ग्रिड कॉरपोरेशन का 80.2 फीसदी, और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन का नेट डेब्ट 52.5 फीसदी बढ़ा है. नेट डेब्ट या शुद्ध कर्ज, कुल कर्ज से कंपनी के पास उपलब्ध नकदी को घटाने से प्राप्त होता है.

इसके बावजूद तीन साल में एनटीपीसी की 20,000 मेगावॉट का कोयला ताप विद्युत गृह और 10,000 मेगावॉट का रिन्यूबल एनर्जी आधारित संयंत्र बनाने की योजना है.


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