तीन साल में 377 खनन मजदूरों की मौत


377 death in 3 years in mines

 

मेघालय की राथोल खदान में फंसे 15 मजदूरों के बचने की संभावना कमजोर पड़ती जा रही है. 370 फीट गहरी इस खदान में फंसे मजदूरों के बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिल पाई है. राहत और बचाव में हुई लेटलतीफी और बदइंतजामी ने आपदा प्रबंधन की तैयारियों की पोल खोल दी है.

काफी इंतजार के बाद खदान से पानी निकालने के लिए 100 हॉर्स पावर के सबमर्सिबल पंप का इंतजाम हो पाया है.

लगातार हुए हादसों के बावजूद सरकार और उत्खनन कंपनियों की ओर से सुरक्षा के कोई पुख्ता कदम नहीं उठाए गए हैं. तीन साल में हुई खनन दुर्घटनाएं इसकी गवाह हैं.  साल 2015 से 2017 के बीच खदान में काम करते हुए 377 मजदूरों की मौत हुई है.

बीजेपी सांसद लक्ष्मण गिलुवा द्वारा लोकसभा में 31 जनवरी 2018 को  पूछे गए एक सवाल के  जवाब में  यह जानकारी सामने आई है कि साल 2015 से 2017 के बीच कोयला, तेल और खनिज के खनन में कुल 377 लोगों की मौत हुई है.

देश के विभिन्न खदानों में साल 2017 में 129, साल 2016 में 145 और साल 2015 में 103 मजदूरों की मौत हुई हैं. इनमें कोल खदानों में मरने वालों की संख्या सबसे अधिक हैं. कुल 377 मौतों में अकेले 210 लोगों की मौत कोयला खदानों में हुई है.

झारखंड में सबसे अधिक 69 मजदूर विभिन्न खदानों में मारे गए. साल 2016 में झारखंड के गोड्डा जिले में स्थित कोयला खदान में हुई दुर्घटना में 23 मजदूरों की मौत हो गई थी.

तीन साल में तेलंगना में 32 और मध्य प्रदेश में 29 मजदूरों की मौत हुई हैं. वहीं, मेटल माइन में काम करने वाले 152 मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी है . झारखंड में सबसे अधिक खनिज का उत्खनन होता है. यहां 48 मजदूरों की मौत हुई है.

लोकसभा में दी गई जानकारी से यह बात भी सामने आई है कि 2015 से 2017 के दरम्यान तेल खदान में काम करने वाले 15 मजदूरों की मौत हुई. इनमें ज्यादातर दुर्घटनाएं असम और गुजरात में हुईं हैं.


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