ऑटो उद्योग क्षेत्र को संकट से उभारने के लिए सरकार का हस्तक्षेप जरूरी


passenger sales slump down in July to 31 percent

 

ऑटोमोबाइल क्षेत्र में आई मंदी की कई वजहें बताई जा रही हैं. चक्रीय कारक, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में तरलता की कमी, तकनीकी परिवर्तन और ग्राहकों की कमजोर धारणा प्रमुख कारण रहे. लेकिन इसमें कोई शक नहीं की ऑटो उद्योग गंभीर समस्या के दौर से गुजर रहा है और अब क्षेत्र में सरकार का हस्तक्षेप जरूरी हो गया है.

ऑटोमोबाइल क्षेत्र में जुलाई महीने में बिक्री दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर चली गई. वित्त वर्ष 2020 की दूसरी छमाही में वृद्धि की उम्मीदें भी धराशाई हो चुकी हैं. देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी ने भी 36.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की है.

इसके अलावा दूसरी कंपनियों में भी 10-15 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. दोपहिया वाहनों की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है. दोपहिया वाहनों की बिक्री में 11 से 15 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. वहीं व्यापारिक वाहनों की बिक्री में 40 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

इस विपरीत स्थितियों के बीच क्षेत्र में तेजी लाने के लिए सरकारी प्रयास ना के बराबर दिख रहे हैं. सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंच (एसआईएएम-सियाम) के उप महानिदेशक सुगातो सेन का कहना है कि “इस उद्योग को तत्काल रूप से सरकार के हस्तक्षेप की जरूरत है ताकि वाहनों की मांग बढ़ सके क्योंकि हमें तो कुछ भी सकारात्मक होता नजर नहीं आ रहा है.”

तीन से चार तिमाहियों में लगातार बिक्री और मार्जिन में गिरावट रही है. जिसकी वजह से अब सहयकों, डीलरों और अन्य हितधारकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. हाल ही में ऑटोमोटिव कम्पोनेंट मैन्युफैक्चर्स असोसिएशन ऑफ इंडिया ने कहा कि अगर लगातार मंदी बनी रही तो लाखों लोगों की नौकरी दाव पर लग जाएगी.

सियाम ने सरकार को सुझाव दिया था कि माल और सेवा कर (जीएसटी) को स्थाई रूप से 28 फीसदी से हटाकर 18 फीसदी कर देना चाहिए. इसके अलावा पुराने वाहनों को हटाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. साथ ही कारों का मूल्यह्रास दर (डेप्रिसिएशन रेट) 15 फीसदी से बढ़कर 25 फीसदी कर दिया जाए. लेकिन सरकार की ओर से अब तक इन सुझावों को लेकर कोई पहल नहीं की गई है.

हालांकि, कई ऐसे उदाहरण हैं जब सरकार ने ऑटो उद्योग में हस्तक्षेप किया था. पिछले दशक में दो बार ऐसे मौके आए जब वाहनों की बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई थी. 2008-09 और 2012-13 में सरकार ने उत्पाद शुल्क में कटौती की थी और मांग को समर्थन देने के लिए राज्य परिवहन उपक्रमों के माध्यम से बसों के लिए आदेश दिए.

पीडब्लयूसी इंडिया के साथी और मोटरवाहन के लीडर कावन मुख्तयार ने कहा, “विकसित बाजारों के लिए भी प्रोत्साहन राशि देना कोई नई बात नहीं है. 2008-09 में अमेरिका में ‘कैश फॉर कसंकर्स’ नाम से की गई पहल का मकसद था कि खरीदारों को पुराने वाहनों को हटाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और साथ ही नई गाड़ी के लिए सब्सिडी दी जाए जिससे बाजार में मांग बढ़ सके.”

उन्होंने कहा, “आगे हालात और बिगड़े इससे पहले सरकार के हस्तक्षेप की जरूरत है. क्योंकि अर्थव्यवस्था में ऑटो उद्योग का कई स्तर पर प्रभाव पड़ता है. जिसमें उपभोगताओं की मांग और औद्योगिकों के मांग के बीच संबंध होता है.”

सीएट टायर्स लिमिटेड के प्रबंध संचालक अनंत गोएनका ने कहा, “सरकार ने अपने नियमों और विनियमों से इस क्षेत्र की स्थिति खुद बिगाड़ी है. सरकार की जल्दबाजी के नियम और विभिन्न शासी निकायों और मंत्रालयों के अप्रत्याशित नीतिगत फैसलों के कारण इस संकट को और भी बदतर कर दिया है. सरकार के वाहनों के पंजीकरण शुल्क बढ़ाने के हालिया प्रस्ताव का समय बहुत गलत था. जब बिक्री हो नहीं रही है ऐसे में 5-10- गुणा पंजीकरण शुल्क बढ़ाने का फैसला तर्कहीन है.”

इसी तरह वाहनों बीमा लागत में वृद्धि और ईंधन पर उपकर लगाने से एक वाहन के स्वामित्व की लागत में भी वृद्धि हुई है.

इस वक्त का तकाजा यह है कि सरकार को कोई ठोस कदम उठाना चाहिए ताकि वाहनों की बिक्री में और गिरावट ना हो पाए.

इसके अलावा सरकार बिजली से चलने वाली वाहनों पर जोर दे रही है. इस कदम से यह जलक रहा है कि सरकार आर्थिक विकास पर पर्यावरण को प्राथमिकता दे रही है.

इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करने के लिए जीएसटी में कटौती कर 18 फीसदी से 5 फीसदी करने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन, कोटक महिंद्रा असेट मैनेजमेंट कंपनी के प्रबंध संचालक निलेश शाह का कहना है, “इससे पहले देश एक क्रमबद्ध तरीके से बीएस-1 से बीएस-6 में गया था. लेकिन अब अगर नियामक प्रौद्योगिकी और दक्षता के मामले में तीसरे पायदान से पहले पायदान पर जाना चाहते हैं तो उन्हें निर्माताओं, फाइनेंसरों, घटक आपूर्तिकर्ताओं, आदि के परामर्श से करना चाहिए. लोगों की आय भी बढ़नी होगी जिससे मांग में बढ़ोत्तरी हो. आकांक्षाएं अच्छी हैं, लेकिन लक्ष्य यथार्थवादी होने की जरूरत है.”

कई विश्लेषकों का मानना है कि भारत के संदर्भ में इलेक्ट्रिक वाहनों को लाने का निर्णय समय से पहले है.

पिछले कुछ वर्षों में लोगों की आय में वृद्धि नहीं हुई है. खुदरा ऑटो की मांग को पूरा करने वाली क्रेडिट लाइनें भी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के उद्योग में संकट के कारण जूझ रही हैं.

अब यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी नियमकों पर है कि भारतीय रिज़र्व बैंक के प्रणाली में क्रेडिट प्रवाह बढ़ाने के उद्देश्य से रेपो दर में कटौती का फायदा उपयोगकर्ताओं को पहुंचे.

उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के अत्यधिक उधार लेने से खुदरा सहित निजी उधारकर्ताओं को क्राउडिंग आउट का सामना करना पड़ रहा है. इसके अलावा, राष्ट्रीय बचत योजनाओं में उच्च जमा दरों का मतलब है कि केंद्रीय बैंक की दरों में कटौती होना. यह सब अधिक प्रभावी नहीं है.

इस बीच 40-50 दिनों की हाई इन्वेंट्री के साथ ऑटो डीलर घाटे में चल रहे हैं. बैंक 25 फीसदी से 30 फीसदी तक कोलैटरल की मांग कर रहे हैं, इसके साथ ही जीएसटी के तहत अग्रिम कर कटौती ने डीलरों के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है.

जाहिर है कि ऑटो उद्योग का गुस्सा निराधार नहीं है. एक साल पहले तक वे बीएस-6 उत्सर्जन मानकों को 1 अप्रैल 2020 से लागू करने के लिए केवल एक बड़ी लागत के लिए तैयार थे. एक वाणिज्यिक वाहन निर्माता ने हाल ही में विश्लेषकों को बताया कि बीएस-6 अकेले ट्रक की लागत में 15 फीसदी से 20 फीसदी तक की वृद्धि करेगा.

अर्थव्यवस्था में तरलता की कमी और मानसून के कारण भी इस संकट में अहम किरदार निभा रहे हैं.

उद्योग और उपभोगताओं के साथ-साथ ऑटो शेयर में हुई गिरावट के कारण निवेशकों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है.


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