शुगर लेवल नियंत्रण के मामले में बहुत पीछे हैं भारतीय: सर्वेक्षण


study shows Indians failing to control blood sugar levels

 

भारत में डायबिटीज (मधुमेह/शुगर) से पीड़ितों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है. इसके बरअक्स देश में इस बीमारी को लेकर लोग उतने ही कम जागरुक हैं. डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति को खून में शुगर की मात्रा के घटने-बढ़ने को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है.

नोवो नोरडिस्क एजुकेशन फाउंडेशन ने देशभर में डायबिटीज से संबंधित एक सर्वेक्षण किया है. यह सर्वेक्षण फार्मास्यूटिकल कंपनी नोवो नोरडिस्क का हिस्सा है. भारत में यह डायबिटीज केयर इंडेक्स रिपोर्ट निकालती है जो देश में डायबिटीज और उससे संबंधित केयर के बारे में बताती है.

मई 2019 में अखिल भारतीय स्तर पर “HbA1c” 8.5 फीसदी था. HbA1c खून जांच का एक प्रकार है. भारत में यह सामान्य से लगभग 3 फीसदी ज्यादा है. इस जांच से तीन महीने में औसतन ब्लड शुगर कंट्रोल लेवल का पता चलता है. इसका खुलासा नोवो नोरडिस्क एजुकेशन फाउंडेशन के साल भर तक चलने वाले सर्वेक्षण से हुआ है.

HbA1c का 6.0 फीसदी से कम होना मतलब डायबिटीज नहीं है. 6.0 – 6.4 फीसदी के बीच होने का मतलब है कि व्यक्ति डायबिटीज होने के कगार पर है. और 6.5 फीसदी और इससे ज्यादा का मतलब है कि व्यक्ति टाइप–2 डायबिटीज से पीड़ित है.

मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली और चेन्नई जैसे महानगरों में ब्लड शुगर कंट्रोल लेवल की स्थिति चिंताजनक है. मुम्बई में औसतन ब्लड शुगर कंट्रोल लेवल 8.2 फीसदी है. दिल्ली की स्थिति और खराब है, यहां औसत लेवल 8.8 फीसदी है. यह सर्वेक्षण 28 शहरों के 1.8 लाख डायबिटीज से पीड़ित लोगों पर की गई है.

डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति के शरीर में ब्लड गुलुकोज को प्रोसेस करने की क्षमता घट जाती है. इससे मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है. और साल दर साल यह किडनी, आंखें और तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) जैसे महत्वपूर्ण अंग को भी प्रभावित करता है.

इस अध्ययन में यह भी पाया गया है कि किस तरह इन 28 शहरों में “HbA1c” लेवल साल भर में बदला है.

बेंगलुरु में जून 2018 से मई 2019 के बीच HbA1c लेवल बढ़कर 8.3 फीसदी से 8.4 फीसदी हो गया है. इसी दौरान चेन्नई में 8.4 फीसदी से 8.2 फीसदी की गिरावट हुई. कोलकाता में 8.4 फीसदी से 8.1 फीसदी की गिरावट हुई है. गुरुग्राम में यह 8.6 फीसदी से घटकर 8.5 फीसदी हो गया है. खांडवा जैसे छोटे शहर में जून 2018 में यह स्तर 9 फीसदी था, जो मई 2019 में घटकर 8.2 फीसदी हो गया है. हैदराबाद में यह स्तर लगभग एक जैसा रहा (8.59 फीसदी और 8.6 फीसदी).

डॉ. अनूप मिश्रा ने कहा, “भारत में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग में डायबिटीज के मरीजों की संख्या बढ़ रही है. उन्हें इस बीमारी के संबंध में बहुत कम जानकारी है. वे कम जागरुक हैं और उन्हें इसे नियंत्रण करने के तरीकों के बारे में भी नहीं मालूम है. इसका नतीजा यह होता है कि कम उम्र में ही औसत से ज्यादा शुगर लेवल और साथ ही जटिलताओं का सामना करना पड़ता है.”

रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है कि 2017 में डायबिटीज केयर पर कुल खर्च 63,000 करोड़ का था. भारत में 7.29 करोड़ डायबिटिक हैं. इनमें से 80 फीसदी का प्रयाप्त इलाज ही नहीं होता है.

गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में एंडोक्रिनोलॉजी विभाग को संचालित करने वाली डॉक्टर अंबरिश मिथाल ने कहा, “भारत में डॉयबीटीज की बीमारी लगातार बढ़ रही है. कुछ वर्ष पहले तक यह ऐसी बिमारी थी जो 40 साल की उम्र से ज्यादा के व्यक्ति को होती थी. लेकिन अब यह बिमारी 20 बरस के युवाओं को भी हो रही है.”

उन्होंने कहा कि उनके अस्पताल में बायपास सर्जरी कराने वाले मरीजों में से 60 फीसदी की बीमारी की मुख्य वजह डायबिटीज है. उन्होंने कहा कि महानगरों में 60 साल से ज्यादा उम्र के लगभग 40 फीसदी लोगों को डायबिटीज है. यह खतरनाक स्थिति है.

मुम्बई के लीलावती अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट, डॉ. शशांक जोशी ने कहा, “शुगर के मरीजों में HbA1c का स्तर 7 फीसदी होना एंडोक्रिनोलॉजिस्ट ठीक मानते हैं. लेकिन कुछ मामलों में इसमें ढील दी जाती है. उम्रदराज लोगों में 7.5 फीसदी और गर्भवती महिलाओं और युवाओं में 6.5 फीसदी होने से डॉक्टर भी संतुष्ट रहते हैं.” उन्होंने कहा कि इस समस्या से निपटने का कारगार उपाय है शुगर लेवल पर नजर रखना और लगातार इसे कम करने की कोशिश करना.

डायबिटीज केयर इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार अनियंत्रित शुगर होने से तीन करोड़ ऐसे मामले पैदा होते हैं जिससे दिल, आंख, किडनी, नसों और पसलियों से जुड़ी समस्याएं होती हैं.

इस कंपनी ने 1000 दिनों के लिए एक “इम्पैक्ट इंडिया” चैलेंज कैपेन की शुरुआत की है. इसका मकसद भारत के औसत HbA1c के स्तर में 2021 तक एक फीसदी की कमी करना है.

डॉ. मिथल ने कहा, “इस बीमारी से निपटने के लिए रोकथाम केंद्र होना चाहिए. लेकिन हमारे मरीजों पर उनके स्वास्थ्य का बोझ होता है. इसके साथ ही परिवार और कामकाज की भी चिंता होती है.”


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