लिव-इन पार्टनर से संबंध बनाना बलात्कार नहीं : सुप्रीम कोर्ट


hearing against abrogation of article 370 to be on 14 november

 

सुप्रीम कोर्ट ने शादी नहीं कर पाने की स्थिति में लिव-इन पार्टनर के साथ बने शारीरिक संबंध को बलात्कार नहीं माना है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि अगर कोई पुरुष नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के चलते महिला से शादी नहीं कर पाता और दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बनता है तो उसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सतर्कता बरतने की जरूरत है.

कोर्ट ने महाराष्ट्र की एक नर्स की ओर से डॉक्टर के खिलाफ दर्ज कराई गई प्राथमिकी को खारिज करते हुए यह बात कही. दोनों ‘कुछ समय तक’ लिव-इन पार्टनर थे.

हालांकि, कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अगर व्यक्ति की मंशा गलत थी या उसके छिपे इरादे थे तो यह स्पष्ट रूप से बलात्कार का मामला था.

जस्टिस एके सिकरी और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने हाल में दिए गए एक फैसले में कहा, ‘‘बलात्कार और सहमति से बनाए गए यौन संबंध के बीच स्पष्ट अंतर है. इस तरह के मामलों को अदालत को पूरी सतर्कता से परखना चाहिए कि क्या शिकायतकर्ता वास्तव में पीड़िता से शादी करना चाहता था या उसकी कोई गलत मंशा थी. अदालत के अनुसार, गलत मंशा और झूठा वादा करना ठगी या धोखा देनी की श्रेणी में आता है.’’

पीठ ने कहा, ‘‘यह संभव है कि पीड़िता ने प्यार और आरोपी के प्रति लगाव के कारण उससे यौन संबंध बनाए हों, न कि आरोपी द्वारा पैदा की गई गलतफहमी के आधार पर. यह भी संभव है कि आरोपी ने चाहते हुए भी ऐसी परिस्थितियों के चलते उससे शादी नहीं की हो जिन पर उसका नियंत्रण नहीं था. इस तरह के मामलों को अलग तरह से देखा जाना चाहिए.’’

प्राथमिकी के मुताबिक, विधवा महिला चिकित्सक के प्यार में पड़ गई थी और वे साथ-साथ रहने लगे थे.

आरोपी ने बंबई हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था जिसने उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी.


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