195 गैर-वित्तीय और गैर-सरकारी कंपनियों का उधार पांच सालों में एम-कैप से ज्यादा


industrial output decline by 1.1 percent in august

 

भारत में कॉर्पोरेट क्षेत्र में दिवाला जोखिम बढ़ा है. देश के कुल 195 गैर-वित्तीय और गैर-सरकारी कंपनियों का उधार पांच सालों में बाजार पूंजीकरण (एम-कैप) से ज्यादा है. मार्च 2019 तक ऐसी 147 कंपनियां थीं और वित्तीय वर्ष 2018 के अंत में ऐसी 99 कंपनियां थीं.

उधारदाताओं के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि अधिकतर कॉर्पोरेट ऋण इन्हीं वित्तीय संकट से जूझती कंपनियों से जुड़ा हुआ है.

संडे बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के मुताबिक कुल 195 कंपनियों को मिला दें तो इन कंपनियों पर अलग-अलग उधारदाताओं का 13 ट्रिलियन बकाया है. यह पिछले पांच सालों में सबसे ज्यादा है. मार्च 2018 की तुलना में 8.8 ट्रिलियन से बढ़कर यह 47.5 फीसदी हो गया है. 2019 मार्च के आखिर में यह 11 ट्रिलियन था.

कुछ कंपनियां जिनका ऋण के अनुपात में बाजार पूंजीकरण कम है उसमें वोडाफोन आइडिया (15.1 फीसदी), टाट मोटर्स (32.7 फीसदी), टाटा पावर (30.4 फीसदी), टाटा स्टील (38.5 फीसदी), जीएमआर इंफ्रास्ट्रक्चर (37.7 फीसदी), आइआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर (17.5 फीसदी), सधभाव इंजीनियरिंग (18.1 फीसदी), अडानी पावर (48.1 फीसदी), जिंदल स्टील (30 फीसदी) और रतन इंडिया पावर (2.7 फीसदी) शामिल हैं. यह 23 अगस्त, 2019 तक कंपनियों के बाजार पूंजीकरण और वित्तीय वर्ष 2019 के आखिर में कुल ऋण पर आधारित.

यह विश्लेषण 742 गैर-वित्तीय कंपनियों पर किए कॉमन सैंपल पर आधारित है. यह कंपनियां बीएसई 500, बीएसई मिडकैप और बीएसई स्मॉल कैप सूचकांक का हिस्सा हैं. इस सैंपल में सरकार के स्वामित्व वाली और ऋण मुक्त कंपनियों को नहीं लिया गया है. इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियां, तेजी से बिकने वाली उपभोक्ता वस्तुएं (एफएमसीजी) और सूचना प्रोद्योगिकी सेवा कंपनियां जैसे टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इन्फोसिस, एचसीएल टेक्नोलॉजीज और विप्रो शामिल हैं.

विश्लेषकों का मानान है कि ऋण और एम-कैप में असंतुलन होने से कॉर्पोरेट डिफॉल्ट नए रूप में पैदा हो सकता है. कम एम-कैप होने से कंपनियों के लिए इक्विटी पूंजी बढ़ाने में मुश्किल पेश आती है. जिससे कंपनियां अपने बैलेंस शीट या फंड संचालन को कम करती हैं.

सूचीबद्ध सभी 54.5 फीसदी कॉर्पोरेट ऋण ऐसी कंपनियों के हैं जिनका एम-कैप अपर्याप्त है. यह मार्च 2018 की तुलना में 40.5 फीसदी से बढ़कर मार्च 2019 के अंत में 46.5 फीसदी हो गया.

इक्विनॉमिक्स रिसर्च एंड एडवाइजरी सर्विसेज के संस्थाक और प्रबंध संचालक जी चोक्कालिंगम ने कहा, “कोई भी कंपनी जितना पूंजी जुटाती है वो पहले से मौजूद एम-कैप का एक हिस्सा होता है. इसलिए जैसे ही किसी भी कंपनी के स्टॉक के दामों में तेजी से गिरावट होती है, उस कंपनी की पूंजी जुटाने की क्षमता भी तेजी से कम हो जाती है. इससे कंपनी पर वित्तीय संकट आता है. वो भी तब जब कंपनी को संचालन और वित्तीय मुश्किलों को दूर करने के लिए तरलता की जरूरत होती है.”

पूंजी प्रधान क्षेत्र की कंपनियों के लिए कम मूल्यांकन से उसके वित्त को संभावित रूप से प्रभावित कर सकती है. इसमें दूरसंचार, बिजली, धातू और खनन, इंफ्रास्ट्रक्चर, कम तरलता, खराब लाभप्रदता और कम एम-कैप शामिल है.

इन कंपनियों को अब आंतरिक स्त्रोतों पर निर्भर होकर अपने ऋण और फंड संचालन को संभालना होगा. यदि आर्थिक मंदी अनुमान से अधिक हो जाए तो ऋण चूक या कॉर्पोरेट विफलता का जोखिम उठाना पड़ सकता है.

इनमें से कई वित्तीय संकट से जूझती कंपनियों के काम करते रहने के लिए नई पूंजी उपलब्ध कराना आवश्यक है. पिछले कुछ वर्षों में इन कंपनियों को घाटा हुआ है. उदाहरण के लिए, 192 कंपनियों में से 72 कंपनियों का एम-कैप अपर्याप्त है. और कुल मिलाकर इनका घाटा 1.14 ट्रिलियन का है.

कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि अगले कुछ तिमाही तक आय में लगारात गिरावट होती रही तो कॉर्पोरेट भारत में डिफॉल्ट के एक नए दौर की उम्मीद है.

आईडीएफसी सिक्योरिटीज के मुख्य अर्थशास्त्री और इक्विटी रणनीतिकार धनंजय सिंहा ने कहा, “हम कॉर्पोरेट क्षेत्र में बैड लोन का एक और दौर देखने वाले हैं. क्योंकि कॉर्पोरेट आय और मूल्यांकन को वैश्विक व्यापार में मंदी होने से झटका लगा है. इसके कारण घरेलू मांग में गिरावट हुई है और उपभोक्ता उन्मुख क्षेत्रों में तनाव बढ़ा है.”

वर्ष 2012 और 2013 में कंपनी के एम-कैप में तेजी से गिरावट होने के चलते कई कॉर्पोरेट प्रभावित हुए थे. इसके कारण वित्तीय संकट से जूझती कंपनियों के लिए नई पूंजी जुटाना मुश्किल हो गया था.


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