मेघालय खनन हादसे से उठते सवाल


Questions arising from Meghalaya Mining accident

 

मेघालय की एक अवैध खदान में बीते 13 दिसंबर से फंसे 15 मजदूरों की बचने की आस अब टूट रही है. बचाव कार्य में जुटी एनडीआरएफ की टीम दबी जुबान में यह स्वीकार भी कर रही है. वहीं, मेघालय के मुख्यमंत्री कोनरा संगमा पहले ही अपनी विवशता जाहिर कर इस मामले से अपना पल्ला झाड़ चुके हैं.

निश्चित ही यह प्रशासनिक विवशता इस पूरी घटना का एक दुखद और हैरतअंगेज पहलू है. हालांकि रैट होल खनन में बचाव कार्य करना आसान नहीं होता. इस खनन तकनीक में कोयला निकालने के लिए इतने संकरे खड्डे किए जाते हैं कि उसके भीतर से एक बार में एक ही मजदूर गुजर सकता है. बचावकर्मियों पर भी यही बात लागू होती है.

फिर, इस बात को लेकर भी अनिश्चितता रहती है कि मजदूर कितनी गहराई में फंसे हैं. बचाव कार्य के दौरान सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य खदान से पानी निकालना होता है, ताकि खदान में फंसे हुए मजदूरों तक जल्दी पहुंचा जा सके. लेकिन मेघालय सरकार ने इस मामले में प्रशासनिक लापरवाही की  भी मिसाल कायम की है. वह बचाव दल को समय रहते 100 हॉर्स पावर के पंप तक मुहैया नहीं करा सकी. जब बात 15 इंसानी जानों की हो तो इस तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं हो सकती.

पर मेघालय की राज्य सरकार पर इस मामले में खड़े होने वाले सवाल इससे कहीं ज्यादा गंभीर हैं. यह बात याद दिलाने की जरुरत नहीं है कि राज्य में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एजीटी) के आदेश से रैट होल तकनीक से कोयला खनन पर साल 2015 से ही पूरी तरह प्रतिबंध था.

एनजीटी ने पाया था कि रैट खनन तकनीक के चलते जयंतिया हिल्स जिले की नदियां प्रदूषित हो रही हैं. इसके अलावा साल 2012 में दक्षिणी गारो जिले में कोयला खनन के चलते 20 मजदूरों के गायब हो जाने का मामला भी उसके सामने था. लेकिन मौजूदा घटना बताती है कि उसके आदेश को राज्य सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया.

दरअसल, राज्य में लगभग 640 टन कोयला भंडार है और ज्यादातर खनन कार्यों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और सुरक्षा इंतजामों का पालन नहीं किया जाता. इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद ने साल 2016 में तीन बड़े खनन हादसों की वजहों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष दिया था कि अक्सर हादसों वाली खदानों में खनन से पूर्व होने वाला तकनीकी आंकलन और सर्वे दोषपूर्ण होता है.

वास्तव में, ऐसे मामलों से जुड़ा एक सामाजिक यथार्थ भी है, जिसे संबोधित किए जाने की जरुरत है. आम तौर पर अवैध खनन कार्यों में बेहद निर्धन पृष्ठभूमि के मजदूर कार्य करते हैं. उनके पास रोजगार के सीमित अवसर होते हैं. यह दायित्व भी राज्य सरकार का है कि वह उन्हें रोजगार के संतोषजनक अवसर मुहैया करवाए. फिर भी यह सवाल अनुत्तरित है कि आखिर क्यों पूरी तरह प्रतिबंधित रैट होल तकनीक से कोयला खनन का कार्य पूर्वोत्तर राज्यों में जारी है.

 


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