देश की संपत्ति बेचने में मोदी सरकार ‘नंबर वन’
नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां पूरी तरह से निजीकरण का समर्थन करती हैं. मतलब कि समाज के हाशिए पर रह रहे शोषित लोगों को सस्ते दामों पर जो स्वास्थ्य, शिक्षा और यातायात जैसी मूलभूत सुविधाएं सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाती हैं, नव-उदारवादी नीतियां इसका विरोध करती हैं.
दूसरे शब्दों में कहें तो ये नीतियां सभी प्रकार की सुविधाओं के वितरण को सरकार के हाथों से छीनकर पूंजीपतियों के हाथों में दे देना चाहती हैं.
यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि वर्तमान की मोदी सरकार इन नीतियों की घोर समर्थक है. इसलिए वह बहुत तेजी से इन नीतियों को देश में लागू कर रही है. निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग से प्राप्त डाटा के अनुसार इस साल मोदी सरकार ने 15,247 करोड़ रुपये कीमत की सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्ति को बेच दिया है.
यही नहीं, मोदी सरकार को शासन करते हुए लगभग पांच साल होने वाले हैं और समय-समय पर खुद को सबसे प्रखर राष्ट्रवादी कहने वाली यह सरकार सार्वजनिक परिसंपत्ति बेचने में अब तक की सबसे अव्वल सरकार साबित हुई है. मोदी सरकार ने अब तक कुल-मिलाकर 2.09 लाख करोड़ रूपये की सार्वजनिक परिसंपत्ति बेच डाली है.
सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्ति बेचने का यह सिलसिला तब शुरू हुआ था, जब 1991 में कांग्रेस की सरकार ने अर्थव्यवस्था का नव-उदारीकरण किया था. तब से अगर देखें तो हम पाएंगे कि 1991 से 1996 तक रही कांग्रेस सरकार ने 9,962 करोड़ रुपये का विनिवेश अर्थात् सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्ति बेची थी. इसके बाद अगले दो सालों में यूनाइटेड फ्रंट की सरकार ने 1,290 करोड़ का विनिवेश किया.
इसके बाद आई अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार. यह 1998 से 2004 तक रही और इसने 33,656 करोड़ रुपये का विनिवेश किया. यह अपने आप में चौंकाने वाला था क्योंकि वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार भी राष्ट्रवादी होने का ढोल पीटा करती थी. आगे 2004 से 2014 के बीच मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए 1 और यूपीए 2 ने कुल 1,07,883 करोड़ रुपये की सार्वजनिक परिसंपत्ति बेच डाली.
हालांकि, विनिवेश करने की दृष्टि से यह साल मोदी सरकार के लिए अब तक अच्छा नहीं बीता है. लगभग साढ़े सात महीने बीत जाने के बाद सरकार अपने तय लक्ष्य से बहुत पीछे चल रही है. असल में मोदी सरकार ने इस साल 80,000 करोड़ रुपये कीमत की सार्वजनिक परिसंपत्ति बेचने का लक्ष्य रखा है और अब तक वह केवल 15,247 करोड़ रुपये का विनिवेश ही कर पाई है.
पिछले कुछ समय में यह देखा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्ति खरीदने में पूंजीपति कोई खासी रुचि नहीं दिखा रहे हैं. इसका प्रमुख कारण यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र खुद संकट से जूझ रहा है. ऐसे में अगले साल होने वाले आम चुनावों के मद्देनज़र सरकार द्वारा निर्धारित अपने लक्ष्य से पीछे चलने के गहरे निहितार्थ हैं. यह बात ध्यान देने योग्य है कि पिछले चार सालों में निजीकरण के खिलाफ ट्रेड यूनियनों ने आर-पार का लड़ाई लड़ी है.
ट्रेड यूनियनों को पता है कि निजीकरण से न केवल बड़े स्तर पर बेरोजगारी पैदा होती है बल्कि आत्मनिर्भरता भी खत्म हो जाती है. वहीं लाख कोशिशों के बाद भी एयर इंडिया का निजीकरण न कर पाने के बाद से बीजेपी नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खिंची हुई हैं.
इन सबके बीच सरकार एक और संकट से जूझ रही है. यह संकट वित्तीय घाटे का है और यह पैदा भी नव-उदारवादी नीतियों की वजह से ही हुआ है. भले ही मोदी सरकार इसे स्वीकार न करे, लेकिन वह भी इससे भलीभांति परिचित है. इसलिए इससे निपटने का सरकार ने एक नायाब तरीका खोज निकाला है. इसकी खोज वित्त मंत्री अरुण जेटली ने की है. इस तरीके में आंकड़ों की बाजीगरी से संकट को बस छुपा दिया जाता है, उसे असल में हल नहीं किया जाता है.
असल में मोदी सरकार वित्तीय घाटे को कम दिखाने के लिए छोटे-छोटे स्तर पर विनिवेश कर कमाई कर रही है. इस साल इसने बीएचइएल और एनसीएल के शेयर बेचकर करीब 14 हजार करोड़ रुपये की कमाई की है. ऊपरी तौर पर देखने से ये बिक्रियां छोटी लग सकती हैं, लेकिन अगले साल बजट पेश करते समय ये अरुण जेटली के बहुत काम आने वाली हैं.
आंकड़ों का यह खेल चलता रहेगा. हर एक सरकार ने इसे खेला है. लेकिन एक सच जो बना रहेगा, वो यह है कि देश की अर्थव्यवस्था आज सबसे खराब दौर से गुजर रही है. निर्यात नीचे जा रहा है, विनिर्माण क्षेत्र में मंदी पसरी हुई है और पूंजीगत वृद्धि मंथर पड़ चुकी है.
सबसे महत्वपूर्ण यह कि नव-उदारवादी ‘जॉबलेस ग्रोथ’ ने रोजगार सृजन की कमर तोड़कर रख दी है. मोदी सरकार आज भले ही आंकड़ों की इस बाजीगरी से असल स्थिति को छुपा ले और इससे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसे नव-उदारवादी संगठन भी खुश हो जाएं, लेकिन आम लोगों की जिंदगी में इससे कुछ भी नहीं बदलने वाला है.