अफ़रा-तफ़री में फैसला?


 

सात जनवरी को नरेंद्र मोदी सरकार ने एक कथित मास्टरस्ट्रोक फैसला लिया। इसके तहत सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए सरकारी नौकरियों और तमाम शिक्षा संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण देने का एलान किया गया। लेकिन उसके अगले दिन- यानी 8 जनवरी को सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्यमंत्री कृष्ण पाल गुर्जर ने लोक सभा में इसके उलट जानकारी दी। कहा कि अगड़े समुदायों के गरीब छात्रों को शिक्षा एवं रोजगार में आरक्षण देने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। ये हैरतअंगेज है। क्या कैबिनेट के निर्णय की जानकारी सामाजिक न्याय मंत्री को नहीं थी? या ये जवाब पहले तैयार किया गया और दस फीसदी आरक्षण का फैसला अफ़रा-तफ़री में लिया गया? क्या ये पूरा मामला सरकार की लचर कार्य-प्रणाली का संकेत नहीं देते? इन सवालों पर एक ख़ास चर्चा।


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